15 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई में कूदे, एक बार तो अंग्रेजों को ट्रेन से फेंक दिया, जानिए कौन है वो सुपर विलेन
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जी हां हम जिस एक्टर की बात कर रहे हैं उनका नाम है रामायण तिवारी. उन्होंने 160 से अधिक फिल्मों में खलनायक के रूप में काम किया. ये अभिनेता असल जिंदगी में देश की आजादी के लिए एक निडर सिपाही था.
उन्होंने अपना घर और परिवार खो दिया और भाग्य से अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई पहुंच गए. कहां हुआ था जन्म? बॉलीवुड के दमदार खलनायक रामायण तिवारी को दर्शक पर्दे पर देख सिहर उठते थे.
उनका जन्म 1916 से 1917 के बीच बिहार के पटना के मनेर में हुआ था. बचपन से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी.
महज 15-16 साल की उम्र में उन्होंने आजादी की लड़ाई में कदम रख दिया था. 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान उन्हें 3 महीने जेल में भी बिताने पड़े.
अंग्रेजों को ट्रेन से नीचे फेंक दिया था कहा जाता है कि एक बार ट्रेन में एक ब्रिटिश अधिकारी से झड़प के दौरान उन्होंने उस अधिकारी को ट्रेन से नीचे फेंक दिया था.
गिरफ्तारी से बचने के लिए वह 1939 और 1940 के बीच अपने परिवार को बताए बिना गुप्त रूप से मुंबई भाग गए. गांव में वापस आने पर रामायण तिवारी की कोई खबर नहीं मिली. गांववालों को लगा हो गए शहीद कई वर्षों तक वो घर वापस नहीं लौटे.
तो उनके परिवार और पूरे गांव का मानना था कि वह देश की सेवा करते हुए शहीद हो गए.
परिवार ने उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से करने की पूरी तैयारी भी कर ली थी. लेकिन तभी किस्मत ने एक अनोखा मोड़ लिया.
मनेर गांव के एक युवक ने मुंबई के एक सिनेमाघर में एक फिल्म देखी और स्क्रीन पर अभिनय कर रहे रामायण तिवारी को पहचान लिया. जैसे ही यह खबर गांव में पहुंची तो मातम खुशी में बदल गई.
मुंबई आने पर तिवारी जी ने प्रभात स्टूडियो में नौकरी कर ली. कैसे मिला रोल?
एक दिन शूटिंग के दौरान जब सपोर्टिंग एक्टर सेट पर नहीं पहुंचे, तो मजबूरन डायरेक्टर ने रामायण तिवारी को वो रोल दे दिया.
फिर उनकी दमदार आवाज और नेचुरल एक्टिंग ने हर किसी का दिल जीत लिया, इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने बिमल रॉय जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया.
अभिनेता ने ‘दो बीघा जमीन’, ‘मधुमती’, ‘यहूदी’ और ‘नीलकमल’ जैसी सुपरहिट फिल्मों में यादगार काम किया.
बॉलीवुड में अपार सफलता हासिल करने के बावजूद तिवारी जी अपनी जड़ों को कभी नहीं भूले. भोजपुरी को पर्दे पर लाने का काम किया देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.
राजेंद्र प्रसाद से प्रेरित होकर रामायण तिवारी ने अपनी मातृभाषा भोजपुरी को सिनेमा के पर्दे पर लाने का बीड़ा उठाया.
उन्होंने भोजपुरी की पहली ऐतिहासिक फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण में अहम भूमिका निभाई और दूसरी सुपरहिट भोजपुरी फिल्म का निर्माण और निर्देशन खुद किया, जिसका नाम ‘लागी नहीं छूटे रामा’ था.
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📡 स्रोत: NewsData.io