राजनीति

1993 में मंत्री को हराया, 30 साल तक राज किया... जानिए कौन हैं पिछोर के ‘अपराजेय कक्काजू’

लेखक: Ranu Parihar अंतिम अपडेट: 13 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
1993 में मंत्री को हराया, 30 साल तक राज किया... जानिए कौन हैं पिछोर के ‘अपराजेय कक्काजू’

पिछोर की धड़कन, कांग्रेस की शान: 30 साल तक अजेय रहे राजनीति के ‘कक्काजू’

शिवपुरी जिले की पिछोर विधानसभा सीट मध्यप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के अभेद्य किले के रूप में पहचानी जाती रही है। इस किले की सियासत में कृष्णपाल सिंह चौहान उर्फ केपी सिंह यानी कक्काजू का नाम तीन दशक तक सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहा। 1993 से 2018 तक लगातार छह विधानसभा चुनाव जीतने वाले केपी सिंह ने विधायक से लेकर मंत्री तक का सफर तय किया और पिछोर की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

कौन हैं कक्काजू?

केपी सिंह का पूरा नाम कृष्णपाल सिंह चौहान है। बुंदेलखंड में लोग उन्हें प्यार और सम्मान से ‘कक्काजू’ कहते हैं। यहां ‘जू’ सम्मान सूचक शब्द के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर छोटे से गांव करारखेड़ा से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले केपी सिंह ने पिछोर के छत्रसाल कॉलेज से छात्र राजनीति में कदम रखा। इसके बाद वे ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में छात्रसंघ अध्यक्ष बने। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन को नई दिशा मिली।

केपी सिंह ने अपने राजनीतिक सफर में अपनी पहचान खुद बनाई। वे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के करीबी और भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे। दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान केपी सिंह सरकार में कद्दावर कैबिनेट मंत्री के तौर पर भी रहे।

विरोधी उन्हें अलग-अलग राजनीतिक विशेषणों के साथ निशाने पर लेते रहे, लेकिन उनके समर्थकों के लिए कक्काजू आज भी पिछोर की राजनीति का बड़ा नाम हैं।

1993 में पहली बड़ी राजनीतिक जीत

केपी सिंह के राजनीतिक सफर में 1993 का विधानसभा चुनाव निर्णायक मोड़ लेकर आया। उस समय पिछोर सीट से भाजपा के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन राजस्व मंत्री लक्ष्मीनारायण गुप्ता उर्फ नन्ना जी चुनाव मैदान में थे। कांग्रेस ने उनके मुकाबले युवा केपी सिंह को उम्मीदवार बनाया।

चुनावी मुकाबले में केपी सिंह ने लक्ष्मीनारायण गुप्ता को पराजित कर राजनीतिक हलकों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इसी जीत के साथ पिछोर विधानसभा क्षेत्र में उनके लंबे राजनीतिक दौर की शुरुआत हुई।

केपी सिंह ने बाद में नन्ना जी के राजनीतिक अनुभव का सम्मान करते हुए कहा था कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन की बारीकियां उनसे सीखी हैं। नन्ना जी के निधन के बाद भी केपी सिंह ने इसे अपनी निजी क्षति बताया था।

छह चुनावी जीत से बना मजबूत राजनीतिक आधार

1993 में मिली जीत के बाद केपी सिंह ने लगातार चुनावी सफलता हासिल की। 1993 से 2018 तक वे पिछोर विधानसभा सीट से लगातार छह बार निर्वाचित हुए। इस दौरान भाजपा सहित विभिन्न दलों ने उनके सामने मजबूत उम्मीदवार उतारे, लेकिन पिछोर में उनका राजनीतिक प्रभाव कायम रहा।

2008 के चुनाव में केपी सिंह को 55,081 वोट मिले और उन्होंने भारतीय जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी को पराजित किया। 2013 में उन्होंने भाजपा के प्रीतम लोधी को 7,113 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में केपी सिंह को 78,995 और प्रीतम लोधी को 71,882 वोट मिले।

2018 का चुनाव उनके लिए सबसे कड़े मुकाबलों में शामिल रहा। केपी सिंह को 91,463 वोट मिले, जबकि भाजपा के प्रीतम लोधी को 88,788 वोट प्राप्त हुए। इस तरह केपी सिंह महज 2,675 वोटों के अंतर से चुनाव जीत सके।

इन लगातार जीतों ने पिछोर विधानसभा को कांग्रेस के मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित किया और केपी सिंह इस राजनीतिक किले के सबसे प्रमुख चेहरे बने रहे।

2023 में बदली चुनावी सीट और टूट गया तीन दशक का सिलसिला

केपी सिंह के राजनीतिक सफर में 2023 का विधानसभा चुनाव सबसे बड़ा मोड़ लेकर आया। करीब तीन दशक तक पिछोर विधानसभा से चुनाव लड़ने के बाद उन्होंने इस बार अपनी परंपरागत सीट छोड़कर शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा।

पिछोर में कांग्रेस ने अरविंद लोधी को उम्मीदवार बनाया, जबकि भाजपा ने प्रीतम लोधी को मैदान में उतारा। दूसरी ओर शिवपुरी से कांग्रेस ने केपी सिंह को चुनाव मैदान में उतारा।

शिवपुरी में भाजपा के देवेंद्र कुमार जैन ने केपी सिंह को 43,030 वोटों के अंतर से पराजित किया। इस हार के साथ 30 साल से चला आ रहा केपी सिंह का लगातार विधानसभा चुनाव जीतने का सिलसिला थम गया।

उधर पिछोर में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के प्रीतम लोधी ने कांग्रेस के अरविंद लोधी को 21,882 वोटों के अंतर से हराया।

हार के बाद भी पिछोर की राजनीति में कायम नाम

2023 की हार ने भले ही केपी सिंह के लगातार चुनाव जीतने के सिलसिले को रोक दिया, लेकिन पिछोर की राजनीति में उनका प्रभाव और पहचान आज भी चर्चा का विषय है। तीन दशक तक एक ही विधानसभा क्षेत्र से लगातार छह चुनाव जीतना मध्यप्रदेश की राजनीति में उनके लंबे राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।

केपी सिंह खुद अपने राजनीतिक सफर को लेकर कह चुके हैं कि वे छह बार विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं और राजनीति में कभी महत्वाकांक्षाओं का बोझ लेकर नहीं चले।

एक छात्र नेता के रूप में राजनीतिक सफर शुरू करने वाले केपी सिंह ने करीब तीन दशक तक पिछोर विधानसभा की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाए रखी। 1993 में एक वरिष्ठ मंत्री को हराकर शुरू हुआ उनका विधानसभा सफर 2023 में शिवपुरी की हार के साथ भले ही थम गया, लेकिन पिछोर की राजनीतिक चर्चा में ‘कक्काजू’ का नाम आज भी एक अलग पहचान रखता है।

💡 पृष्ठभूमि (Background)

यह खबर मध्यप्रदेश की पिछोर विधानसभा सीट पर 1993 से 2018 तक लगातार छह बार जीतने वाले कांग्रेस नेता केपी सिंह ‘कक्काजू’ के राजनीतिक करियर पर प्रकाश डालती है। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कक्काजू ने 30 वर्षों तक अपने क्षेत्र को कांग्रेस की शान बनाकर रखकर राजनीतिक स्थिरता और विकास का प्रतीक बना रखा। उनके लगातार जीतने से क्षेत्र में राजनीतिक संतुलन बना रहा और स्थानीय विकास योजनाएँ निरंतर लागू होती रहीं। आम जनता पर इसका असर यह है कि उनके नेतृत्व में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में सुधार

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Ranu Parihar

रानू परिहार शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो लंबे समय से जनसमस्याओं और सामाजिक मुद्दों को अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाते हैं। वे जमीनी स्तर की खबरों और जनसरोकार से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाते हैं।