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36 साल बाद पाकिस्तान बॉर्डर पर रूसी सेना, तालिबान के साथ मिलकर भारी गोलीबारी

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 23 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
36 साल बाद पाकिस्तान बॉर्डर पर रूसी सेना, तालिबान के साथ मिलकर भारी गोलीबारी

क्या मध्य एशिया में किसी नए और बड़े खतरे का धमाका होने वाला है?

दरअसल रिपोर्ट्स के मुताबिक 20 से 27 अक्टूबर के बीच रूस और उज़्बेकिस्तान की सेनाएं तरमेज ट्रेनिंग सेंटर में एक विशाल जॉइंट मिलिट्री डील कर रही हैं। तरमेज अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा से महज कुछ ही दूरी पर स्थित सबसे रणनीतिक इलाका है। इस अभ्यास में सिर्फ पैदल सैनिक ही नहीं बल्कि भारी तबाही मचाने वाले लड़ाकू हेलीकॉप्टर जमीन पर गस्त लगाने वाले आधुनिक रोबोटिक वॉरफेयर सिस्टम और दुर्गम पहाड़ियों में चप्पे-चप्पे पर नजर रखने वाले निगरानी ड्रोन तैनात किए गए हैं।

यानी रूस और उज़्बेकिस्तान अपनी बॉर्डर सिक्योरिटी को कंक्रीट की दीवार की तरह अभेद बनाने में जुट गए हैं। सवाल उठता है कि आखिर रूस को अफगानिस्तान की सीमा के पास इतना बड़ा सख्ती प्रदर्शन करने की जरूरत क्यों पड़ी?

इसके पीछे तीन सबसे बड़े कारण है। पहला आतंकी घुसपैठ का डर। अफगानिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठन और छोटे हथियार बंद गिरोह उज्बेकिस्तान के रास्ते मध्य एशिया में अस्थिरता फैला सकते हैं। दूसरा मध्य एशिया में दबदबा। रूस इस पूरे रीजन का बिग ब्रदर माना जाता है। ताजाकिस्तान में उसका मिलिट्री बेस पहले से ही और उज़्बेकिस्तान के साथ इस झील से पुतिन यह संदेश दे रहे हैं कि मध्य एशिया में रूस का दबदबा कायम रहेगा।

तीसरा आधुनिक युद्ध तकनीक का टेस्ट। पथरीले और दुर्गम इलाकों में इंसानी सैनिकों से ज्यादा ड्रोंस और रोबोटिक असरदार होते हैं। रूस यहां अपनी नई तकनीक का लाइव टेस्ट कर रहा है। अब आइए इस कहानी के सबसे दिलचस्प मोड़ पर आते हैं। एक तरफ जहां रूस सैन्य ताकत के दम पर सीमाएं सील कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ भारत की रणनीति पूरी तरह अलग और अनोखी है।

भारत ने अफगानिस्तान में बंदूकों से नहीं बल्कि विकास और दोस्ती से जगह बनाई है। सलमा डैम से लेकर काबुल की संसद इमारत और टरंज डेलाराम हाईवे तक भारत ने अफगान लोगों का दिल जीत लिया है। भुखमरी और संकट के समय भारत ने लगातार गेहूं, दवाइयां, राहत सामग्री भेजकर यह साबित किया है कि भारत हर हाल में एक सच्चा दोस्त है।

अब सवाल है कि क्या भारत और रूस की सोच एक जैसी है?

हां भी और ना भी। जहां दोनों एक हैं। भारत, रूस और उज़्बेकिस्तान तीनों ही यह कतई नहीं चाहते हैं कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवाद फैलाने के लिए हो। जहां रास्ते अलग है। रूस का ध्यान मिलिट्री अलायंस पर ज्यादा है। जबकि भारत व्यापार, कनेक्टिविटी और मानवीय संबंधों पर फोकस कर रहा है।

और यहां काम आता है ईरान का चाबहार पो। चाबहार के जरिए भारत बिना पाकिस्तान पर निर्भर रहे। सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक पहुंच बना रहे। अगर क्षेत्र में शांति रही तो यह चाबहार रूट पूरे एशिया की अर्थव्यवस्था की तकदीर बदल सकता है। तो रूस का यह सैन अभ्यास साफ दिखाता है कि मध्य एशिया में सुरक्षा का माहौल बहुत ही ज्यादा संवेदनशील है।

📡 स्रोत: NewsData.io

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