1,500 रुपये की सहायता से आगे: लाड़ली बहनों के आत्मनिर्भर भविष्य के लिए रोजगार कब?
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महिला सशक्तिकरण का अगला कदम आर्थिक सहायता के साथ स्थायी रोजगार और नियमित आय सुनिश्चित करना होना चाहिए
मध्यप्रदेश में महिला सशक्तिकरण को लेकर लंबे समय से विभिन्न योजनाओं और पहलों के माध्यम से प्रयास किए जा रहे हैं। लाड़ली बहना योजना के तहत महिलाओं को प्रतिमाह 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि निश्चित रूप से तत्काल राहत का माध्यम है, लेकिन बदलती आर्थिक परिस्थितियों और बढ़ती घरेलू जरूरतों के बीच यह सवाल विचारणीय है कि क्या केवल 1,500 रुपये की मासिक सहायता से महिला को वास्तविक रूप से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है?
1,500 रुपये प्रतिमाह यानी करीब 50 रुपये प्रतिदिन। भोजन, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, दवाइयां, आवागमन और अन्य घरेलू आवश्यकताओं के बढ़ते खर्च के बीच यह राशि निश्चित तौर पर कुछ मदद कर सकती है, लेकिन इसे स्थायी आर्थिक सुरक्षा का आधार मानना कठिन है।
इसलिए महिला सशक्तिकरण की नीति को आर्थिक सहायता से आगे बढ़ाकर रोजगार, कौशल विकास और नियमित आय के अवसरों से जोड़ने पर विचार किया जाना चाहिए। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल उसके बैंक खाते में सहायता राशि पहुंचाना नहीं, बल्कि उसके हाथ में अपनी आय अर्जित करने का अवसर देना भी है।
सहायता जरूरत के समय सहारा दे सकती है, लेकिन स्थायी आत्मनिर्भरता के लिए रोजगार और नियमित आय अधिक महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
यदि सरकार प्रत्येक पात्र परिवार से कम से कम एक महिला को उसकी योग्यता और क्षमता के अनुसार कुशल, अर्द्धकुशल या अकुशल रोजगार से जोड़ने की दिशा में ठोस नीति बनाए और कम से कम 5,000 रुपये मासिक आय के अवसर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखे, तो इसका लाभ महिला के साथ पूरे परिवार को मिल सकता है।
इससे महिला केवल किसी सरकारी योजना की लाभार्थी नहीं रहेगी, बल्कि परिवार की आर्थिक व्यवस्था में सक्रिय भागीदार भी बनेगी। यह अंतर केवल 1,500 और 5,000 रुपये का नहीं है। 1,500 रुपये तत्काल राहत दे सकते हैं, जबकि नियमित 5,000 रुपये की आय महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम हो सकती है।
अपनी आय होने से महिला का आत्मविश्वास बढ़ेगा और परिवार के आर्थिक निर्णयों में उसकी भागीदारी भी मजबूत होगी। इसका सकारात्मक प्रभाव बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार के भविष्य से जुड़े निर्णयों पर भी पड़ सकता है। इसके लिए महिला-केंद्रित रोजगार नीति को मौजूदा सरकारी योजनाओं से जोड़ा जा सकता है।
पंचायतों, सरकारी संस्थानों, विद्यालयों, आंगनवाड़ी केंद्रों, स्वयं सहायता समूहों, लघु उद्योगों और स्थानीय रोजगार गतिविधियों में महिलाओं के लिए अवसर विकसित किए जा सकते हैं। साथ ही कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार की वास्तविक उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
केवल प्रशिक्षण देकर छोड़ देने के बजाय प्रशिक्षण से रोजगार तक की पूरी व्यवस्था विकसित की जाए तो सहायता आधारित व्यवस्था को धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता आधारित व्यवस्था में बदला जा सकता है। महिला को वर्षों तक केवल लाभार्थी बनाए रखना सशक्तिकरण की अंतिम मंजिल नहीं हो सकती।
वास्तविक सशक्तिकरण तब होगा, जब महिला के पास अपनी नियमित आय, अपने श्रम की पहचान और अपने भविष्य से जुड़े निर्णय लेने की आर्थिक क्षमता होगी। इसलिए सवाल लाड़ली बहना योजना की आर्थिक सहायता के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। सवाल यह है कि सहायता के साथ महिलाओं को स्थायी आय का रास्ता कैसे उपलब्ध कराया जाए।
सरकार को ऐसी नीति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, जिसमें जरूरतमंद परिवारों की कम से कम एक महिला को उसकी योग्यता के अनुरूप रोजगार, कौशल विकास और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस प्रयास हों।
लाड़ली बहनों के सामने भी यह विचार करने का विषय है कि क्या भविष्य केवल हर महीने मिलने वाली सहायता राशि तक सीमित रहना चाहिए, या ऐसी व्यवस्था की मांग होनी चाहिए जिसमें सहायता के साथ स्थायी रोजगार और नियमित आय का अवसर भी मिले। महिलाओं को केवल सहारा नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिलना चाहिए।
1,500 रुपये की सहायता तत्काल राहत दे सकती है, लेकिन स्थायी रोजगार और नियमित आय आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकते हैं। इसलिए महिला सशक्तिकरण की अगली दिशा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें महिला के खाते में केवल सहायता राशि ही नहीं, बल्कि उसके श्रम और मेहनत की सम्मानजनक कमाई भी पहुंचे। यही वास्तविक आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा होगी।
✍️ कुमारी प्रियंका लेखिका: सामाजिक कार्यकर्ता-चिंतक