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अफसर बनने के लिए पुल तक दौड़ता था, वहीं डूबा:नेवी टेस्ट पास कर अफसर बनने की थी तैयारी; मां बोली- बेटा डूबता रहा, मैं चिल्लाती रह गई

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 2 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
अफसर बनने के लिए पुल तक दौड़ता था, वहीं डूबा:नेवी टेस्ट पास कर अफसर बनने की थी तैयारी; मां बोली- बेटा डूबता रहा, मैं चिल्लाती रह गई

भिंड के कनावर में क्वारी नदी का वह पुल कृष्णा भदौरिया के लिए सिर्फ नदी पार करने की जगह नहीं था। वह रोज सुबह यहीं तक दौड़ता था। सपना था अफसर बनने का। नेवी का टेस्ट पास कर चुका था और अब फिजिकल परीक्षा की तैयारी कर रहा था। जिस नदी के पुल तक वह रोज अपने सपने के लिए दौड़ता था, रविवार को उसी नदी में गणपति विसर्जन के दौरान उसकी जिंदगी की दौड़ थम गई।

कृष्णा अपने दोस्तों मदन सिंह भदौरिया और अभिजीत सिंह भदौरिया के साथ गणपति प्रतिमा विसर्जित करने क्वारी नदी पहुंचा था। नदी में कुछ कदम आगे बढ़ते ही गहरे गड्ढे में तीनों डूब गए। मां पार्वती नदी किनारे खड़ी यह सब अपनी आंखों के सामने देखती रही। उसने मदद के लिए आवाज लगाई, लेकिन जब तक लोग पहुंचते, तीनों पानी में समा चुके थे।

भास्कर की पड़ताल में इस हादसे से जुड़ा एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। जिस जगह कृष्णा, मदन और अभिजीत डूबे, उसी स्थान पर करीब 5-6 साल पहले अभिजीत के बड़े भाई की भी डूबने से मौत हो चुकी है। परिवार का कहना है कि पहले हादसे के बाद भी यहां नदी की गहराई और गड्ढे को लेकर कोई स्थायी सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई।

पहली बार घर में गणपति महोत्सव हुआ, कृष्णा ही दोस्तों को लेकर निकला परिवार के मुताबिक इस बार कृष्णा के घर पहली बार गणपति महोत्सव मनाया गया था। घर में गणपति की स्थापना के बाद पूरे परिवार में उत्साह था। विसर्जन के लिए कृष्णा ने अपने करीबी दोस्तों मदन और अभिजीत को बुलाया। करीब 8 से 10 लड़के कृष्णा और उसकी मां पार्वती के साथ क्वारी नदी पहुंचे।

नदी के दूसरे किनारे पर भी गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन चल रहा था। कृष्णा और उसके दोस्त चाहते थे कि प्रतिमा को जल्दी से विसर्जित कर वापस लौट आएं। जिस जगह से वे नदी में उतरे, वहां शुरुआत में पानी करीब एक फीट ही दिखाई दे रहा था। इसी वजह से किसी को आगे गहराई होने का अंदाजा नहीं हुआ। कुछ कदम आगे बढ़ते ही नदी का तल अचानक गहरा हो गया।

पहले मदन गहरे पानी में गया, बचाने उतरे कृष्णा-अभिजीत भी डूबे परिजनों के मुताबिक मदन सबसे पहले गहरे पानी की तरफ चला गया। उसे परेशानी में देखकर कृष्णा उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा। अभिजीत भी दोनों को बचाने के प्रयास में पानी में उतर गया। देखते ही देखते तीनों गहरे गड्ढे में चले गए और डूब गए।

नदी किनारे खड़ी कृष्णा की मां पार्वती ने जब तीनों को गहराई की तरफ जाते देखा तो उसने उन्हें वापस आने के लिए आवाज लगाई। वह लगातार मदद के लिए चिल्लाती रही। नदी के दूसरे किनारे और पुल पर मौजूद लोगों ने भी घटना देखी, लेकिन गहराई अधिक होने से तत्काल उन्हें बाहर नहीं निकाला जा सका। देखिए मौत के पहले की तीन तस्वीरें… कृष्णा ने भाई को किनारे पर रुकने कहा था, वही भाई पुलिस को फोन करता रहा कृष्णा के छोटे भाई विष्णु भी उनके साथ नदी पर गया था।

कृष्णा ने उसे किनारे ही रहने और वीडियो बनाने के लिए कहा था। विष्णु ने बताया कि जैसे ही तीनों पानी में गए और स्थिति बिगड़ी, उसने तुरंत पुलिस को फोन किया और गांव के लोगों को घटना की जानकारी दी। इसके बाद ग्रामीण नदी के पास पहुंचे और तीनों को तलाशने का प्रयास शुरू किया। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन की टीम भी मौके पर पहुंची।

मां बोली- बेटा अफसर बनने के लिए रोज दौड़ता था कृष्णा की मां पार्वती के लिए बेटे की मौत का दर्द इसलिए भी गहरा है क्योंकि वह उसकी तैयारी को रोज अपनी आंखों के सामने देखती थी। कृष्णा सुबह उठकर क्वारी नदी के पुल तक दौड़ने जाता था। वह नेवी का टेस्ट पास कर चुका था और फिजिकल परीक्षा की तैयारी में जुटा था।

परिवार के मुताबिक कृष्णा पढ़ाई के साथ अपनी फिटनेस पर भी लगातार मेहनत करता था। मां उसे रोज दौड़ते हुए देखती थी और बेटे के अफसर बनने का सपना पूरा होने की उम्मीद करती थी। पार्वती कहती हैं कि बेटे को देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था। उन्हें भरोसा था कि कृष्णा मेहनत करके आगे बढ़ेगा। लेकिन जिस नदी के किनारे वह अपने भविष्य के लिए दौड़ता था, उसी नदी में उसे खोना पड़ा।

अभिजीत के परिवार का दर्द दोहरा, इसी जगह पहले भाई की भी गई जान अभिजीत सिंह भदौरिया के भाई किशन सिंह ने बताया कि करीब 5-6 साल पहले उनके बड़े भाई की भी इसी जगह नदी में डूबने से मौत हुई थी। वह काली माता मंदिर में भागवत कथा के दौरान नदी में नहाने के लिए गए थे। पानी में आगे जाने पर वह गहरे गड्ढे में चले गए और डूब गए थे।

अब उसी जगह अभिजीत की भी मौत हो गई। किशन का कहना है कि जब इस स्थान पर पहले भी डूबने से मौत हो चुकी थी तो गणपति विसर्जन के दौरान यहां विशेष सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए थी। उनका आरोप है कि मौके पर गोताखोर की व्यवस्था नहीं थी। यदि पहले से गोताखोर और बचाव दल मौजूद होता तो तीनों के पानी में जाने के बाद तुरंत रेस्क्यू शुरू किया जा सकता था।

मदन को कृष्णा का फोन आया, पिता दिल्ली में थे; बिना बताए निकल गया मदन सिंह के पिता चंदू सिंह रेलवे कैटरिंग में काम करते हैं। घटना के समय वह दिल्ली में थे। परिवार के मुताबिक मदन को कृष्णा का फोन आया था। दोस्तों के साथ गणपति विसर्जन के लिए वह घर से निकल गया। पिता को बाद में बेटे के डूबने की सूचना मिली।

वह दिल्ली से लौटने की तैयारी करने लगे, लेकिन तब तक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट चुका था। चंदू सिंह का आरोप है कि गणपति विसर्जन के लिए प्रशासन की ओर से कोई निश्चित सुरक्षित स्थान तय नहीं किया गया था। लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार नदी में अलग-अलग जगहों से उतरकर विसर्जन किया। उनके मुताबिक नदी में गहराई वाले स्थान की पहचान के लिए न कोई स्पष्ट निशान था और न शाम के समय मौके पर पुलिस मौजूद थी।

ग्रामीण बोले- पहले भी हो चुकी मौत, फिर भी तय नहीं किया सुरक्षित रास्ता ग्रामीण देवेंद्र भदौरिया ने भी प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस जगह पहले भी युवक की डूबने से मौत हो चुकी है, वहां गणपति विसर्जन के दौरान पुलिस, गोताखोर और सुरक्षित रास्ते की व्यवस्था पहले से की जानी चाहिए थी।

ग्रामीणों के मुताबिक नदी के किनारे पानी कम दिखाई देता है, लेकिन कुछ दूरी पर अचानक गहराई बढ़ जाती है। बाहर से देखने पर यह गहरा गड्ढा नजर नहीं आता। यही वजह है कि लोग पानी की वास्तविक गहराई का अंदाजा नहीं लगा पाते। देवेंद्र का आरोप है कि हादसे के बाद भी प्रशासन की प्रतिक्रिया को लेकर परिवारों में नाराजगी है।

उनका कहना है कि भिंड कलेक्टर किरोड़ी लाल मीणा करीब 36 घंटे बाद मौके पर पहुंचे और कुछ मिनट रुककर लौट गए। ग्रामीण का आरोप है कि उन्होंने पीड़ित परिवारों से बातचीत भी नहीं की। तीन दोस्त साथ निकले थे, अब तीनों घरों में मातम कृष्णा, मदन और अभिजीत तीनों 12वीं कक्षा के छात्र थे और आपस में करीबी दोस्त थे।

गणपति विसर्जन के लिए तीनों साथ निकले थे। परिवारों को उम्मीद थी कि कुछ देर बाद वे प्रतिमा विसर्जित कर वापस घर लौट आएंगे। कृष्णा के परिवार में पहली बार गणपति महोत्सव हुआ था। जिस उत्साह के साथ प्रतिमा घर लाई गई थी, उसी उत्साह में विसर्जन के लिए परिवार और दोस्त नदी तक पहुंचे थे। किसी ने नहीं सोचा था कि यह विसर्जन तीन परिवारों के लिए जिंदगीभर का दर्द बन जाएगा।

एक तरफ कृष्णा का अफसर बनने का सपना था, दूसरी तरफ अभिजीत के परिवार का पुराना जख्म फिर हरा हो गया। मदन के पिता बेटे के दोस्त के बुलावे पर घर से निकलने की बात तक नहीं जान पाए और दिल्ली में बैठे-बैठे बेटे की मौत की खबर मिली।

📡 स्रोत: NewsData.io

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