AIMIM उत्तर प्रदेश में चुनाव क्यों लड़ रही है? क्या कोई राजनीतिक डील हुई है? मजलिस के पूर्व नेता तौकीर निजमी ने उठाए सवाल
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पीरजादा तौकीर निजामी, पूर्व नेता AIMIM मध्यप्रदेश लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसी बीच AIMIM के चुनावी विस्तार को लेकर पार्टी के पूर्व नेता पीरजादा तौकीर निजामी ने सवाल खड़े किए हैं।
उनका कहना है कि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाने के बावजूद यदि AIMIM अब करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, तो इस रणनीति के पीछे का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
निजामी के अनुसार AIMIM ने 2017 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रवेश किया था और 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। उनके मुताबिक पार्टी को करीब 2.04 लाख वोट मिले और उसका वोट शेयर लगभग 0.24 प्रतिशत रहा। चुनाव में पार्टी का कोई उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर सका और सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।
उनका आरोप है कि उस चुनाव के दौरान धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया, लेकिन उसका चुनावी परिणाम पार्टी के पक्ष में नहीं आया। निजामी का मानना है कि इसका एक राजनीतिक प्रभाव विपक्षी वोटों के बिखराव के रूप में सामने आया, जिसका लाभ भाजपा को मिला।
हालांकि यह एक राजनीतिक विश्लेषण है और वोट विभाजन तथा चुनावी परिणाम के बीच सीधा कारणात्मक संबंध अलग से स्थापित किए जाने की आवश्यकता है।
2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर निजामी कहते हैं कि पार्टी के पास पांच वर्ष का पर्याप्त समय था, जिसमें बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया जा सकता था, जमीनी कार्यकर्ताओं को तैयार किया जा सकता था और अनुभवी राजनीतिक चेहरों को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा सकती थीं।
उनके अनुसार 2022 में AIMIM ने 97 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक बार फिर पार्टी विधानसभा में अपना खाता नहीं खोल सकी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की चर्चाओं को निजामी पार्टी की रणनीति के संदर्भ में बड़ा सवाल मानते हैं।
उनका कहना है कि 2017 में 38, 2022 में 97 और अब करीब 200 सीटों पर उतरने की संभावित रणनीति के पीछे स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य और रोडमैप सामने आना चाहिए। निजामी सवाल उठाते हैं कि जब पिछली दो विधानसभा चुनावी कोशिशों में पार्टी एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी, तो इतने बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ने का फैसला किस रणनीति पर आधारित है।
क्या इसका उद्देश्य केवल संगठन का विस्तार और राजनीतिक उपस्थिति बढ़ाना है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक समीकरण भी है? उनका कहना है कि किसी राजनीतिक दल की आलोचना करना या उससे सवाल पूछना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है।
उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं, बल्कि AIMIM की चुनावी रणनीति, संगठनात्मक प्राथमिकताओं और उसके राजनीतिक प्रभाव पर बहस खड़ी करना है।
निजामी का तर्क है कि यदि प्राथमिक राजनीतिक लक्ष्य भाजपा को सत्ता से रोकना है तो विपक्षी दलों की चुनावी रणनीति में इस बात पर भी विचार होना चाहिए कि विपक्षी वोटों का अनावश्यक विभाजन किस तरह रोका जा सकता है। उनके मुताबिक अपनी राजनीतिक कयादत और संगठन को मजबूत करने की कोशिश के साथ व्यापक विपक्षी रणनीति पर भी चर्चा जरूरी है।
वे कहते हैं कि सियासत केवल नारों और भावनाओं से नहीं चलती, बल्कि चुनावी राजनीति में संगठन, रणनीति और परिणाम भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए उनका सवाल है कि 2027 में करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी आखिर AIMIM की किस दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
निजामी ने इस पूरे विषय पर आगे भी कई सवाल उठाने और AIMIM की चुनावी राजनीति का विश्लेषण जनता के सामने रखने की बात कही है। उनके अनुसार अंतिम फैसला राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि चुनाव में जनता का होगा।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
इस खबर में बताया गया है कि AIMIM ने उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेने का निर्णय लिया है और पूर्व नेता तौकीर निजमी ने इसके पीछे के कारणों पर सवाल उठाए हैं। यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि AIMIM का यह कदम राज्य की राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता है और अन्य दलों के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर सकता है। यदि AIMIM बड़ी संख्या में सीटें जीतता है, तो यह धार्मिक और क्षेत्रीय राजनीति में बदलाव ला सकता है, जिससे आम जनता को अधिक विकल्प मिलेंगे और चुनावी गतिशीलता में बदलाव आ सकता है।