ऐन जालूत की जंग: वो लड़ाई जिसने मक्का और मदीना को मंगोलों के हाथों में जाने से बचा लिया
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इतिहास में कुछ जंगें सिर्फ दो फ़ौजों के बीच नहीं लड़ी जातीं, बल्कि पूरी तहज़ीब, ईमान और आने वाली नस्लों के भविष्य का फैसला करती हैं। 3 सितंबर 1260 को फ़िलिस्तीन की धरती पर लड़ी गई बैटल ऑफ़ ऐन जालूत ऐसी ही एक जंग थी। अगर उस दिन नतीजा उल्टा होता, तो शायद आज मक्का और मदीना का इतिहास भी कुछ और होता।
1258 में हलाकू ख़ान ने बगदाद को तबाह कर दिया। लाखों लोग मारे गए, अब्बासी ख़िलाफ़त खत्म हो गई और दुनिया का सबसे बड़ा इल्मी मरकज़ राख में बदल गया। कहा जाता है कि दजला नदी का पानी किताबों की स्याही से काला और इंसानों के ख़ून से लाल हो गया था। बगदाद के बाद दमिश्क भी मंगोलों के कब्ज़े में चला गया। अब अगला निशाना मिस्र था, और मिस्र के बाद हिजाज़, यानी मक्का और मदीना तक पहुंचने का रास्ता लगभग खुल जाता।
उस दौर में मंगोल सिर्फ एक फ़ौज नहीं थे, बल्कि दहशत का दूसरा नाम थे। चीन से लेकर रूस तक और समरकंद से लेकर बगदाद तक जो भी उनके सामने आया, कुचल दिया गया। मुसलमानों के दिलों में यह डर बैठ चुका था कि मंगोलों को हराना नामुमकिन है। बहुत से लोग उन्हें याजूज-माजूज तक समझने लगे थे।
ऐसे वक्त में मिस्र की हुकूमत एक ऐसे शख्स के हाथ में थी जो पैदा बादशाह नहीं हुआ था। वह एक ममलूक, यानी कभी गुलाम रह चुका इंसान था। उसका नाम था सुल्तान सैफुद्दीन कुतुज़। उसकी ज़िंदगी भी किसी अफसाने से कम नहीं थी। मंगोलों ने उसके खानदान को उजाड़ दिया था, वह खुद गुलाम बनाकर बेचा गया था, लेकिन किस्मत ने उसे मिस्र का सुल्तान बना दिया। अब उसके सामने सवाल सिर्फ अपनी सल्तनत बचाने का नहीं था, बल्कि पूरे इस्लामी दुनिया की आखिरी मजबूत दीवार बचाने का था।
जब हलाकू ख़ान ने आत्मसमर्पण का फरमान भेजा, तो कई लोगों ने सलाह दी कि मंगोलों से टकराना खुदकुशी होगी। लेकिन कुतुज़ ने झुकने से इनकार कर दिया। उसने मंगोल दूतों को मौत की सजा दी और उनके सिर काहिरा के दरवाजे पर टंगवा दिए। यह सिर्फ जवाब नहीं था, बल्कि ऐलान था कि अब बातचीत नहीं होगी, फैसला तलवार करेगी।
कुतुज़ अकेले नहीं थे। उनके साथ एक बेहतरीन फौजी दिमाग था, रुक्नुद्दीन बैबर्स। दोनों ने फैसला किया कि मंगोलों का मुकाबला किलों में छिपकर नहीं, बल्कि मैदान में जाकर किया जाएगा। उन्होंने फ़िलिस्तीन के ऐन जालूत इलाके को चुना, जहां पहाड़ियां और तंग रास्ते मंगोलों की सबसे बड़ी ताकत, उनकी तेज घुड़सवार सेना, को कमजोर कर सकते थे।
जंग शुरू हुई। बैबर्स ने वही चाल चली जिससे मंगोल आधी दुनिया जीत चुके थे। उन्होंने पीछे हटने का नाटक किया। मंगोल पूरे जोश में उनका पीछा करते हुए घाटी के अंदर तक आ गए। जैसे ही पूरी मंगोल फ़ौज जाल में फंसी, पहाड़ियों के पीछे छिपी ममलूक सेना अचानक निकल आई। चारों तरफ से हमला हुआ। पहली बार मंगोलों को एहसास हुआ कि शिकारी खुद शिकार बन चुका है।
लेकिन जंग अभी खत्म नहीं हुई थी। मंगोलों ने पलटवार किया और ममलूक फ़ौज की कतारें टूटने लगीं। उसी वक्त सुल्तान कुतुज़ ने अपना हेलमेट उतारकर फेंक दिया, तलवार उठाई और पूरी ताकत से पुकारा "वा इस्लामा... वा इस्लामा!" यानी "हाय मेरे इस्लाम!"। यह किसी बादशाह का भाषण नहीं था, यह उस इंसान की पुकार थी जिसे लग रहा था कि अगर आज हार गए तो शायद मक्का, मदीना और अल-कुद्स तक सुरक्षित नहीं रहेंगे। उनका जोश देखकर भागते हुए सिपाही वापस लौटे और फिर ऐसा हमला हुआ कि मंगोलों की अजेय होने की छवि हमेशा के लिए टूट गई।
ऐन जालूत सिर्फ एक जंग नहीं थी। यह वह दिन था जब दुनिया ने पहली बार देखा कि मंगोलों को हराया भी जा सकता है। अगर उस दिन ममलूक हार जाते, तो मिस्र भी बगदाद की तरह तबाह हो सकता था और हिजाज़ की रक्षा करने वाली आखिरी बड़ी ताकत खत्म हो जाती। इतिहास में निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि मक्का और मदीना पर मंगोलों का कब्ज़ा हो ही जाता, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनके सामने पहुंचने वाली सबसे बड़ी सैन्य बाधा टूट जाती। यही वजह है कि बहुत से इतिहासकार ऐन जालूत को इस्लामी इतिहास का निर्णायक मोड़ मानते हैं।
इस जीत के बाद भी कुतुज़ की ज़िंदगी लंबी नहीं चली। काहिरा लौटते समय उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन उनके बाद बैबर्स ने ममलूक सल्तनत को इतना मजबूत किया कि मंगोल फिर कभी मिस्र या हिजाज़ की तरफ उसी ताकत से बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके। बाद में मंगोल शासक बरके ख़ान, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था, ने भी हलाकू ख़ान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और मंगोल साम्राज्य की एकता टूट गई।
आज जब हम ऐन जालूत को याद करते हैं, तो यह सिर्फ एक पुरानी जंग की कहानी नहीं लगती। यह हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी पूरी तारीख़ कुछ गिने-चुने लोगों के हौसले पर टिक जाती है। अगर उस दिन कुतुज़ और उनके साथी डर जाते, समझौता कर लेते या हथियार डाल देते, तो शायद इतिहास की किताबें कुछ और लिख रही होतीं।
तारीख़ हमेशा बड़ी सल्तनतों को याद नहीं रखती। वह उन लोगों को भी याद रखती है जो सबसे मुश्किल वक्त में यह कहने की हिम्मत रखते हैं- झुकेंगे नहीं, मुकाबला करेंगे।