राजनीति

अमरमणि के चुनाव लड़ने में कानूनी अड़चन:घोषणा तो कर दी; उम्मीदवारी में पेंच फंसेगा

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 2 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
अमरमणि के चुनाव लड़ने में कानूनी अड़चन:घोषणा तो कर दी; उम्मीदवारी में पेंच फंसेगा

पूर्व मंत्री एवं मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में लगभग 16 साल जेल की सजा काटने वाले अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा से चुनाव लड़ने की घोषणा कर महराजगंज की राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया। उनके चुनाव लड़ने से राजनीतिक नफे-नुकसान की बातें की जाने लगीं।

लेकिन अपनी इस योजना को धरातल पर उतारना अमरमणि के लिए उतना आसान नहीं होगा, जितना घोषणा करना था। उनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षा की राह में कानूनी अड़चन है। जिससे उनकी उम्मीदवारी में पेंच फंसना तय है।

कानून के जानकार कहते हैं कि प्रदेश सरकार की नीति के अनुरूप अच्छे आचरण के लिए अमरमणि को माफी जरूर मिली है लेकिन कोर्ट ने जो आजीवन कारावास की सजा दी थी, वह खत्म नहीं हुई है। ऐसे में वह चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

कुछ दिन पहले महराजगंज जिले के फरेंदा विधानसभा क्षेत्र में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए अमरमणि त्रिपाठी ने कहा था "मैं लडूंगा यहां से...नौतनवां से मेरा बेटा लड़ेगा।" उनका यह बयान काफी वायरल हुआ है। जब से यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, इसके राजनीतिक निहितार्थ निकाले जाने लगे हैं।

महराजगंज के साथ ही आसपास के जिलों में राजनीतिक प्रभाव की चर्चा भी होने लगी है। लेकिन कुछ लोग उनके चुनाव लड़ पाने को लेकर संशय में हैं। जानिए कानूनी अड़चन कोई ऐसा व्यक्ति जिसे किसी न्यायालय से 2 साल से अधिक की सजा मिली हो तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता।

जब तक ऊपरी कोर्ट इस सजा पर स्टे नहीं दे देती या सजा को खत्म नहीं कर देती। यदि कोई व्यक्ति 2 साल से अधिक की सजा पा चुका है तो उसके लिए चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाता है। लेकिन यदि कोई ऊपरी कोर्ट सजा को स्टे कर दे या राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति से पूरी सजा माफ कर दी जाए तो व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है।

लेकिन अमरमणि के मामले में ऐसा नहीं है। उनकी पूरी सजा माफ नहीं हुई है। यह है अमरमणि का केस अमरमणि को अक्टूबर 2007 में आजीवन कारावास की सजा मिली थी। वर्तमान में आजीवन कारावास की कोई समय सीमा नहीं है। सजा माफी को लेकर सरकार की 2018 की नई नीति आयी है। इसमें अच्छे आचरण के चलते बाकी सजा माफ की जा सकती है।

अमरमणि के केस में भी इसी नीति का प्रयोग किया गया। आजीवन कारावास के केस में 16 साल की जेल पूरी होनी चाहिए। 2023 में अमरमणि और उनकी पत्नी की 16 साल की जेल पूरी हो चुकी थी। हालांकि गिरफ्तारी से जोड़ें तो वे लगभग 20 साल जेल में रहे। अच्छे आचरण का हवाला देकर सरकार ने उनकी बाकी सजा माफ कर दी और वह जेल से बाहर आ गए।

लेकिन चूंकि उनकी सजा को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने स्टे नहीं किया है, इसलिए वह चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। इसके साथ ही यदि राज्यपाल या राष्ट्रपति उनकी पूरी सजा माफ कर देते तो भी वह चुनाव लड़ सकते थे। ऐसे में उनकी इस घोषणा को केवल पॉलिटिकल स्टंट माना जा रहा है। अपने पुत्र के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश।

अमरमणि के चाचा को फांसी की सजा हुई थी, फिरभी 5 बार विधायक बने श्यामनारायण तिवारी, अमरमणि के चाचा हैं। 1968 में हुए एक हत्याकांड में उन्हें कोर्ट ने दोषी पाया था और फांसी की सजा दी थी। श्याम नारायण ने फांसी की सजा माफ करने के लिए राष्ट्रपति के यहां अर्जी लगाई थी।

राष्ट्रपति ने उनकी अर्जी स्वीकार कर ली और उनकी फांसी की सजा माफ कर दी गई। इसके बाद वह फरेंदा सीट से 5 बार विधायक बने और प्रदेश सरकार में मंत्री बने। लेकिन भतीजे अमरमणि के साथ यह संयोग काफी मुश्किल लग रहा है। अब जानिए कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं हाईकोर्ट में अधिवक्ता अखिल कुमार सिंह कहते हैं कि अमरमणि का केस अलग है।

इन्हें स्थानीय कोर्ट से 2007 में सजा हुई थी। राज्य सरकार की नीति के मुताबिक आजीवन कारावास की सजा के मामले में 16 साल जेल में बिता चुके सजायाफ्ता की अच्छे आचरण के कारण शेष सजा माफ करने की सिफारिश की जा सकती है। इसी का लाभ अमरमणि व उनकी पत्नी को मिला। राज्यपाल की सहमति से अमरमणि व उनकी पत्नी की शेष सजा माफ कर दी गई।

लेकिन यह कार्यपालिका का फैसला है और इससे 2007 में कोर्ट द्वारा दिए गए आजीवन कारावास की सजा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। चूंकि इस मामले में अमरमणि को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से सजा पर कोई स्टे नहीं मिला है इसलिए वह चुनाव लड़ने के अर्ह नहीं होंगे।

📡 स्रोत: NewsData.io

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