अमेरिका के टैरिफ से कालीन का एक्सपोर्ट थमा:50 साल पुराने उद्योग का 70% एक्सपोर्ट अमेरिका जाता था; लागत 35% और मजदूरी 15% बढ़ी, कालीन के दाम 15% ही बढ़े
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →ग्वालियर-चंबल के गांवों में पांच दशक से हाथों से बुनी जा रही कालीन की पहचान देश ही नहीं, विदेशों तक बनी है। अमेरिका, कनाडा, दुबई, कतर, बैंकॉक और सिंगापुर तक इसकी मांग रही है। इनमें अमेरिका सबसे बड़ा विदेशी बाजार रहा है। यहां से एक्सपोर्ट होने वाली करीब 70% कालीन अमेरिका जाती थी, लेकिन अमेरिकी टैरिफ में बढ़ोतरी, ईरान संकट और शिपिंग-इंश्योरेंस की बढ़ी लागत ने इस कारोबार की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया।
टैरिफ अब कम होने से कारोबारियों को नए ऑर्डर लौटने की उम्मीद है। इसी बीच उद्योग को बिचौलियों से निकालकर सीधे ग्राहक तक पहुंचाने के लिए ऑनलाइन मार्केट और ई-कॉमर्स को नया रास्ता बनाया जा रहा है। 50% तक बढ़ा टैरिफ...
अब घटने से जागी उम्मीद, ट्रेनिंग- ई-कॉमर्स से बिचौलिया हटा सीधे बिक्री मुरैना में 50 डिजाइन, ग्वालियर की पर्शियन कालीन...
मुरैना की हाथ से बुनाई से करीब 50 तरह के डिजाइन तैयार किए जाते हैं। इनमें मुगल कारपेट, मुगल गार्डन, खटरास, कविता, कुंभ, काशियान, मुगल तराश, अमरीश पर्दा और अफगानी डिजाइन प्रमुख हैं। 95% वूल और 5% कॉटन से बनी मखमली कालीन की विदेशों में डिमांड रही। ग्वालियर में हैंड-नॉटेड पर्शियन और आर्टिफिशियल सिल्क कालीन बनती हैं।
कारोबार इसलिए गडबड़ाया : कालीन से जुड़े कारोबारियों के अनुसार मटेरियल की कीमत करीब 35% और मजदूरी 15% बढ़ चुकी है, जबकि कालीन की कीमत में करीब 15% ही वृद्धि हुई है। ऑनलाइन के लिए कारोबारियों को ट्रेनिंग दे रहे 50% इंपोर्ट ड्यूटी-टैरिफ बढ़ने से कारोबार कम हुआ। अब टैरिफ कुछ कम हुआ है।
अब कारोबारियों को ई-कॉमर्स साइट्स से व्यापार की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि ग्राहकों तक सीधे पहुंच बने। -डॉ.
स्मिता नागरकोटी, एग्जीक्यूटिव, कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल
📡 स्रोत: NewsData.io