अंबाजी, यंत्र शक्ति का रूप:यहां मूर्ति नहीं सोने की परत वाले यंत्र की पूजा होती है, इस यंत्र के सीधे दर्शन करने पर भी रोक
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →गुजरात के अंबाजी मंदिर में देवी की मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में सोने की परत वाले श्री वीसा यंत्र की पूजा होती है। यंत्र के सीधे दर्शन और फोटो लेने पर रोक है। इस यंत्र की पूजा में आंखों पर पट्टी बांधने की परंपरा है। इस यंत्र का वस्त्र और आभूषणों के श्रृंगार कर के देवी की मूर्ति जैसा रूप बनाया जाता है।
इस मंदिर से करीब 3-4 किलोमीटर दूर गब्बर पहाडी है। इसे देवी का मूल स्थान माना जाता है। गब्बर पहाडी की परिक्रमा में 47 मंदिर, तीन गुफाएं और एक अखंड ज्योति हैं। इन्हें मिलाकर 51 शक्तिपीठों के स्वरूप के दर्शन होते हैं। गर्भगृह में मूर्ति नहीं, यंत्र की पूजा होती है; इसी के श्रृंगार से बनता है देवी का स्वरूप गर्भगृह की दीवार में एक आला है।
इसे गोख कहते हैं। इसी में श्री वीसा यंत्र स्थापित है। देवी की आराधना इस पवित्र रेखाचित्र के रूप में होती है। यंत्र को सीधे देखने की अनुमति नहीं है। गोख के ऊपरी हिस्से को वस्त्र, मुकुट और आभूषणों से सजाया जाता है। श्रद्धालुओं को इसी सजे हुए देवी स्वरूप के दर्शन होते हैं। अंबाजी माता मंदिर अरावली की आरासुर पहाडियों पर बना है।
इसलिए देवी को आरासुरी अंबा कहा जाता है। मंदिर के पास मानसरोवर कुंड है। इसके चारों ओर सीढियां बनी हैं। कुंड के किनारे महादेव और अजय देवी के मंदिर हैं। स्थानीय मान्यता में अजय देवी को अंबाजी की बहन माना जाता है। एक ही देवी के तीन रूप: सुबह बालरूप, दोपहर युवती और शाम को वृद्धा के दर्शन की परंपरा अंबाजी में देवी का श्रृंगार दिन के तीन समय के अनुसार बदलता है।
सुबह उन्हें बालिका, दोपहर में युवा और शाम को वृद्ध महिला के स्वरूप में सजाया जाता है। इसके लिए वस्त्र और आभूषण बदले जाते हैं। इस तरह बिना मूर्ति के देवी की तीन अवस्थाओं का दर्शन कराया जाता है। मंदिर में देवी का वाहन भी वार के हिसाब से बदलता है। रविवार को बाघ, सोमवार को नंदी, मंगलवार को सिंह, बुधवार को ऊंची सूंड वाला ऐरावत हाथी, गुरुवार को गरुड़, शुक्रवार को हंस और शनिवार को नीचे की ओर सूंड वाले ऐरावत का स्वरूप सजाया जाता है।
नवरात्रि: पहले दिन घट स्थापना, अष्टमी को ज्वारों का उत्थापन अंबाजी में इस बार 11 अक्टूबर को सुबह 9 से 10:30 बजे के बीच घट स्थापना और शारदीय नवरात्रि की विशेष पूजा शुरू हुई। मंदिर में कलश के साथ जौ बोने की परंपरा है। इनसे निकलने वाले अंकुरों को ज्वारे कहते हैं। नवरात्रि में इनकी विशेष आरती होती है।
19 अक्टूबर को दुर्गाष्टमी पर सुबह 6 बजे देवी की विशेष आरती होगी। सुबह 10 बजे उत्थापन का कार्यक्रम रखा गया है। इसमें नवरात्रि के लिए स्थापित ज्वारों और पूजा से जुड़ा समापन अनुष्ठान होता है। अगले दिन 20 अक्टूबर को विजयादशमी पर शाम 4 बजे शमी पेड़ का पूजन होगा। शरद पूर्णिमा पर आधी रात दूध-पोहे का भोग और विशेष आरती अंबाजी में शारदीय नवरात्रि के बाद शरद पूर्णिमा पर भी देवी की विशेष पूजा होती है।
इस बार 25 अक्टूबर की मध्यरात्रि में माता को दूध-पोहे का भोग अर्पित करने और कपूर आरती का कार्यक्रम है। दूध-पोहे में दूध के साथ चपटा चावल यानी पोहा मिलाया जाता है। गुजरात में शरद पूर्णिमा पर इसे बनाने और देवी को अर्पित करने की परंपरा है। 26 अक्टूबर को सुबह 6 बजे पूर्णिमा की विशेष आरती होगी।
इस तरह 11 अक्टूबर की घट स्थापना के बाद 19 अक्टूबर तक नवरात्रि के प्रमुख अनुष्ठान होंगे। फिर 20 अक्टूबर को विजयादशमी और 25-26 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा की पूजा होगी। पहाड़ी पर 51 शक्तिपीठों की रेप्लिका, करीब 3 घंटे में पूरी परिक्रमा गब्बर पहाड़ी के चारों ओर देश के 51 शक्तिपीठों की रेप्लिका बनाई गई हैं।
ऐसा इसलिए किया गया ताकि श्रद्धालु एक ही जगह पर अलग-अलग शक्तिपीठों के स्वरूप और उनकी पूजा परंपराओं को जान सकें। यह परिसर 20 समूहों में बनाया है। इसके परिक्रमा मार्ग की लंबाई करीब 2.85 किलोमीटर है। पूरी परिक्रमा करने में करीब तीन घंटे लगते हैं। इन मंदिरों में पूजा करने वाले पुजारियों को संबंधित शक्तिपीठों की परंपराओं की ट्रेनिंग भी दी गई है।
इसके लिए वे मूल शक्तिपीठों के पुजारियों के पास गए थे। 61 फीट के शिखर पर सोने की परत, इसके लिए 140 किलो सोना दान में मिला अंबाजी मंदिर सफेद संगमरमर से बना है। इसके मुख्य स्वर्ण शिखर की ऊंचाई 61 फीट है। शिखर की नाप लेकर तांबे की चादरें तैयार की गईं। उन पर मंदिर की नक्काशी के हिसाब से आकृतियां उकेरी गईं।
फिर सोने की परत लगाकर चादरें शिखर पर स्थापित की गईं। यह काम सितंबर 2018 को पूरा हुआ था। इसके लिए श्रद्धालुओं ने सोना और धन दान किया। ट्रस्ट की वेबसाइट पर सोने के शिखर के लिए कुल 140 किलो सोना दान में मिलने का आंकड़ा दर्ज है। मोहनथाल को जीआई सर्टिफिकेट, राजभोग के बाद पैक होता है प्रसाद मोहनथाल अंबाजी का पारंपरिक राजभोग है।
यह बेसन, गाय के घी, दूध, चीनी और इलायची से बनता है। इसकी पहचान पीला रंग और दानेदार बनावट है। बेसन में घी और दूध मिलाकर पीतल के बर्तन में मिश्रण तैयार किया जाता है। इसमें इलायची और चीनी की चाशनी मिलाते हैं। जमाने की प्रक्रिया के बाद मिश्रण को ट्रे में फैलाकर करीब 7-8 घंटे ठंडा किया जाता है।
तैयार मोहनथाल का देवी को राजभोग लगता है। इसके बाद पैकिंग होती है और प्रसाद श्रद्धालुओं को मिलता है।
📡 स्रोत: NewsData.io