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अंबर कवच-4 में ड्रोन पर सेना की पैनी नजर

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 2 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
अंबर कवच-4 में ड्रोन पर सेना की पैनी नजर

महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में भारतीय सेना ने ड्रोन खतरे के खिलाफ अपनी युद्धक तैयारियों को परखा। ‘डिटेक्ट, डिसरप्ट, डिस्ट्रॉय’ के जरिए बहुस्तरीय ड्रोन रोधी सुरक्षा का किया अभ्यास। बीकानेर।

राजस्थान के बीकानेर स्थित महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में भारतीय सेना ने तेजी से बढ़ते ड्रोन और मानवरहित हवाई यानों के खतरे से निपटने के लिए अपनी युद्धक तैयारियों का प्रदर्शन किया। एक्सरसाइज अंबर कवच-4 के दौरान सेना की विभिन्न सैन्य टुकड़ियों और फॉर्मेशन की लड़ाकू तैयारी को परखा गया।

अभ्यास का उद्देश्य ड्रोन रोधी अभियानों से जुड़ी रणनीतियों, तकनीकों और प्रक्रियाओं को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में परखना, उनमें सुधार करना और उनकी प्रभावशीलता को सुनिश्चित करना रहा। अभ्यास के दौरान ‘डिटेक्ट, डिसरप्ट, डिस्ट्रॉय’ यानी पहचानो, बाधित करो और निष्क्रिय करो की अवधारणा को प्रमुखता दी गई।

इसके तहत सबसे पहले ड्रोन खतरे की पहचान और निगरानी, उसके बाद उसकी संचालन क्षमता को बाधित करने और आवश्यकता पड़ने पर उसे निष्क्रिय करने की प्रक्रिया पर जोर दिया गया।

इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य ड्रोन खतरे के खिलाफ ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा तैयार करना है, जिसमें किसी खतरे के सामने आने पर अलग-अलग स्तरों पर प्रभावी प्रतिक्रिया दी जा सके। आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।

निगरानी, टोह लेने और लक्ष्य की पहचान सहित कई सैन्य गतिविधियों में मानवरहित हवाई प्रणालियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो चुकी है। इनके तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने सेनाओं के सामने नए तरह के खतरे भी पैदा किए हैं।

ऐसे में ड्रोन की समय रहते पहचान करना और उसके खिलाफ तत्काल एवं प्रभावी कार्रवाई करना सैन्य तैयारियों का अहम हिस्सा बन गया है। महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित अभ्यास के दौरान सक्रिय और निष्क्रिय ड्रोन रोधी उपायों को प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया गया।

वास्तविक समय जैसी सामरिक परिस्थितियों का अभ्यास कराया गया और सटीक लक्ष्य पहचान की क्षमता को भी परखा गया। इसका उद्देश्य सैनिकों को ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार करना रहा, जहां युद्धक्षेत्र में ड्रोन खतरा अचानक सामने आए और उस समय तेजी से निर्णय लेने के साथ-साथ विभिन्न स्तरों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत हो।

ड्रोन रोधी अभियान में सबसे पहले खतरे की पहचान महत्वपूर्ण होती है। किसी ड्रोन की समय रहते पहचान होने पर उसके खिलाफ प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए जरूरी समय मिल सकता है। इसके बाद उसकी संचालन क्षमता को बाधित करना और आवश्यकता पड़ने पर उसे निष्क्रिय करना सुरक्षा की अगली कड़ियां हैं।

अंबर कवच-4 में इन क्षमताओं को एक साथ जोड़कर बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के रूप में परखा गया। अभ्यास में वास्तविक समय जैसी सामरिक परिस्थितियों के जरिए सैनिकों की निर्णय लेने की क्षमता पर भी जोर दिया गया। युद्धक्षेत्र में ड्रोन खतरा बहुत कम समय में सामने आ सकता है।

ऐसी स्थिति में खतरे की पहचान, उसका आकलन और जवाबी कार्रवाई के बीच बेहतर तालमेल बेहद महत्वपूर्ण होता है। अभ्यास का उद्देश्य सैनिकों को इसी तरह के दबाव और तेजी से बदलती परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करने के लिए तैयार करना रहा।

अंबर कवच-4 में ड्रोन रोधी अभियानों से जुड़ी रणनीतियों, तकनीकों और प्रक्रियाओं का परीक्षण भी किया गया। ड्रोन तकनीक लगातार विकसित हो रही है और इसके साथ खतरे का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे में सेना के लिए अपनी रणनीतियों और प्रक्रियाओं को नियमित रूप से परखना और आवश्यकतानुसार उनमें सुधार करना महत्वपूर्ण है।

इस तरह के अभ्यास सैनिकों और फॉर्मेशन को अपनी तैयारियों की समीक्षा करने तथा उन्हें भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप मजबूत करने का अवसर देते हैं। सटीक लक्ष्य पहचान भी अभ्यास का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। किसी हवाई खतरे की सही पहचान और उसके स्थान का सटीक निर्धारण प्रभावी ड्रोन रोधी कार्रवाई के लिए जरूरी है।

युद्धक्षेत्र में केवल खतरे को पहचान लेना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसकी स्थिति और प्रकृति का तेजी से आकलन भी आवश्यक होता है। मैदानी परिस्थितियों में इस तरह की क्षमताओं का अभ्यास सैनिकों को अधिक वास्तविक परिस्थितियों के लिए तैयार करने में मदद करता है।

अभ्यास में सक्रिय और निष्क्रिय दोनों तरह के ड्रोन रोधी उपायों के संयोजन पर जोर दिया गया। सक्रिय उपाय संभावित खतरे के खिलाफ जवाबी कार्रवाई पर केंद्रित होते हैं, जबकि निष्क्रिय उपाय सैनिकों और महत्वपूर्ण सैन्य संसाधनों की सुरक्षा बढ़ाने में मदद करते हैं।

इन दोनों क्षमताओं को एक साथ इस्तेमाल करने वाली बहुस्तरीय व्यवस्था का उद्देश्य ड्रोन आधारित खतरों के सामने सैन्य संसाधनों और सैनिकों की सुरक्षा को मजबूत करना है। महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित अंबर कवच-4 भविष्य के युद्धक्षेत्र की बदलती जरूरतों के बीच भारतीय सेना की तैयारियों को भी दर्शाता है।

मानवरहित हवाई प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ युद्ध की प्रकृति में तेजी से बदलाव आ रहा है। ऐसे में पारंपरिक सैन्य क्षमताओं के साथ आधुनिक तकनीक आधारित खतरों से निपटने की क्षमता विकसित करना भी जरूरी हो गया है।

अभ्यास के दौरान परखी गई क्षमताओं से यह भी स्पष्ट हुआ कि ड्रोन खतरे से निपटने के लिए केवल तकनीकी साधन पर्याप्त नहीं हैं। सैनिकों का प्रशिक्षण, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता, सामरिक प्रक्रियाओं की समझ और विभिन्न स्तरों के बीच तालमेल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

नियमित अभ्यासों के माध्यम से इन सभी पहलुओं को मजबूत करने से सेना की समग्र परिचालन तैयारी बेहतर होती है।

एक्सरसाइज अंबर कवच-4 के जरिए भारतीय सेना ने ड्रोन और मानवरहित हवाई खतरों के खिलाफ अपनी तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया। ‘डिटेक्ट, डिसरप्ट, डिस्ट्रॉय’ की अवधारणा के तहत खतरे की पहचान से लेकर उसे बाधित करने और जरूरत पड़ने पर निष्क्रिय करने तक की बहुस्तरीय व्यवस्था को परखा गया।

महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में हुआ यह अभ्यास भविष्य के तकनीक आधारित युद्धक्षेत्र में भारतीय सेना की लड़ाकू तैयारी और परिचालन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।