अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस : बचपन की चौपाल में बुजुर्गों ने ताजा की सत्तर के दशक की यादें
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जोधपुर में अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर “बचपन की चौपाल” कार्यक्रम में बुजुर्गों ने गीत, खेल और अंताक्षरी के जरिए 70 के दशक की यादें ताजा कीं। पारंपरिक खेलों और पुराने घरेलू सामान की प्रदर्शनी ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
जोधपुर, 1 अक्टूबर। अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर पर सहयोग टाइम बैंक की ओर से “बचपन की चौपाल—बड़ों के संग लौटेगा बचपन” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठजनों ने गीत, खेल, अंताक्षरी और संवाद के माध्यम से सत्तर के दशक की पुरानी यादों को फिर से जीवंत किया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार बलवंत राज मेहता ने सत्तर के दशक की सहज जीवनशैली, सामाजिक जुड़ाव और आपसी रिश्तों से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने उस दौर की दिनचर्या और लोगों के बीच आपसी मेलजोल के बारे में अपने विचार रखे।
कार्यक्रम के दौरान केयरगिवर्स आशा सोसायटी के विशेषज्ञों ने वरिष्ठजनों की शारीरिक और मानसिक देखभाल से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव दिए। विशेषज्ञों ने बढ़ती उम्र में स्वास्थ्य के साथ मानसिक सक्रियता और सामाजिक जुड़ाव को भी महत्वपूर्ण बताया।
आयोजन में लगाई गई प्रदर्शनी में पुराने चूल्हे, सिगड़ी और पारंपरिक बर्तन प्रदर्शित किए गए। इसके साथ ही वरिष्ठजनों ने चौपड़, सांप-सीढ़ी, लूडो, कैरम, कंचे और गिल्ली-डंडा जैसे पारंपरिक खेल खेलकर अपने बचपन के दिनों को फिर से जिया।
सहयोग टाइम बैंक की प्रतिनिधि अंचलिया और रवीसा सुराणा ने बताया कि एकाकी परिवारों के बढ़ते चलन के बीच बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करना और पुरानी सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सहेजना इस पहल का उद्देश्य है।
कार्यक्रम में वरिष्ठजनों ने पुराने गीतों और खेलों के साथ एक-दूसरे के अनुभव साझा किए। आयोजन का समापन भावपूर्ण माहौल में सामूहिक तस्वीरों के साथ हुआ।
बाईट - बलवंत राज मेहता, वरिष्ठ पत्रकार
बाईट - अंचलिया, सहयोग टाइम बैंक
💡 पृष्ठभूमि (Background)
अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस के मौके पर जोधपुर में ‘बचपन की चौपाल’ कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें बुजुर्गों ने गीत, खेल और अंताक्षरी के माध्यम से 1970 के दशक की यादें ताजा कीं। यह विषय समाज में बुजुर्गों की सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित करने पर केंद्रित है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि वृद्ध पीढ़ी अपने अनुभव और परंपराओं को युवा पीढ़ी के साथ साझा कर रही है, जिससे पीढ़ीगत दूरी कम हो सकती है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि लोग बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सहानुभूति बढ़ाएँ, और सामु