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अपनों ने ठुकराया तो रक्तदाता समूह ने निभाया फर्ज:अंतिम दर्शन करने को भी राजी नहीं हुआ परिवार, विधि विधान से अंतिम संस्कार

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 19 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
अपनों ने ठुकराया तो रक्तदाता समूह ने निभाया फर्ज:अंतिम दर्शन करने को भी राजी नहीं हुआ परिवार, विधि विधान से अंतिम संस्कार

इटावा में रिश्तों की बेरुखी के चलते लावारिश की तरह रेखा देवी का अंतिम संस्कार एक संस्था के द्वारा विधि विधान से किया गया। उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय में छह दिन तक उपचार के बाद 55 वर्षीय रेखा देवी की मौत हो गई। मौत के बाद पति, तीन बेटों और मायके पक्ष ने शव लेने से इनकार कर दिया।

परिवार के आगे न आने पर रविवार शाम चार बजे पुलिस की मौजूदगी में रक्तदाता समूह के सदस्यों ने यमुना घाट पर पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया। जानकारी के अनुसार रेखा देवी को 21 अगस्त को गंभीर हालत में एंबुलेंस कर्मियों ने उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय सैफई में भर्ती कराया था।

उपचार के दौरान सात सितंबर की दोपहर 12 बजे उनकी मौत हो गई। सूचना के बाद सैफई थाना पुलिस ने उनके पति शिवनाथ से संपर्क किया। शिवनाथ औरैया जिले के दिबियापुर थाना क्षेत्र के कनमऊ गांव के रहने वाले हैं। पुलिस ने परिवार से अंतिम संस्कार के लिए आगे आने की अपील की, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ। 10 सितंबर तक परिवार का कोई सदस्य अस्पताल नहीं पहुंचा तो रक्तदाता समूह की टीम ने कनमऊ गांव के प्रधान अनमोल यादव से संपर्क किया।

प्रधान के माध्यम से पति शिवनाथ और उनके तीन बेटों आशीष 30 वर्ष, गोलू 25 वर्ष और राधे 23 वर्ष से संपर्क किया गया। उन्हें शव लेने और अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन परिवार ने रेखा देवी का शव लेने से साफ इनकार कर दिया। परिजनों ने पुलिस और रक्तदाता समूह को बताया कि करीब 15 साल पहले रेखा देवी गांव के ही संजू यादव नाम के शादीशुदा व्यक्ति के साथ घर छोड़कर चली गई थीं।

कुछ समय पहले संजू की मौत हो गई थी। इसके बाद रेखा देवी कहां रहीं और किस स्थिति में रहीं, इसकी जानकारी परिवार को नहीं थी। इसी पुराने विवाद और सामाजिक दूरी के चलते पति और बेटों ने उनसे संबंध खत्म कर लिए थे।

📡 स्रोत: NewsData.io

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🎙️ वॉयस ऑफ क्रांति का मत

रक्तदाता समूह के साहस से हमें यह सिखने को मिलता है कि जब परिवार की बेरुखी जीवन को नकार देती है, तो समाज की एकजुटता और मानवीय दायित्व हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। हर व्यक्ति को अपने प्रियजनों के प्रति दया और सम्मान का बंधन निभाना चाहिए। संघर्ष के समय कानूनी मार्ग, मध्यस्थता और संवाद से समाधान निकाला जा सकता है। इस घटना से हमें याद दिलाता है कि सहानुभूति और सहयोग ही समाज को सच्ची शक्ति देते हैं।

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