'बच्चे माता-पिता की संपत्ति नहीं,वे उनके संरक्षक हैं':हाईकोर्ट ने नाबालिग का बिना देरी किए पासपोर्ट जारी करने के दिए आदेश, कहा- पिता की सहमति जरूरी नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद का असर बच्चे के भविष्य और शिक्षा के अधिकार पर नहीं पड़ना चाहिए।
जस्टिस अनूप कुमार ढंढ की बेंच ने स्पष्ट किया कि बच्चे माता-पिता की संपत्ति नहीं, बल्कि कानून की नजर में स्वतंत्र हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि माता-पिता उनके संरक्षक हैं, मालिक नहीं। यह मामला एक नाबालिग से संबंधित है, जिसने अपनी मां के माध्यम से विदेश में उच्च शिक्षा के लिए पासपोर्ट जारी करने का आवेदन किया था।
पिता की सहमति नहीं होने के कारण पासपोर्ट जारी नहीं किया गया था। इसके बाद एडवोकेट राहुल सोनी के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। 2002 में हुई थी शादी कोर्ट को बताया गया कि बच्चे के माता-पिता की शादी 2002 में हुई थी। वैवाहिक विवाद के बाद दोनों अलग रहने लगे।
पारिवारिक न्यायालय, पाली ने 9 जून 2022 को पिता की वैवाहिक अधिकार बहाली संबंधी याचिका खारिज कर दी थी और मां की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद कर दिया था। इसके बाद पिता ने बच्चे की अभिरक्षा या मुलाकात के अधिकार के लिए कोई आवेदन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने माना कि बच्चा अपनी मां की वैध अभिरक्षा में है और दसवीं कक्षा में उसका प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा है। विदेश में उच्च शिक्षा उसके भविष्य और करियर के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में केवल पिता की सहमति नहीं होने के तकनीकी आधार पर पासपोर्ट रोकना उचित नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। पासपोर्ट नियमों के तहत निर्धारित अनुलग्नक-सी में शपथपत्र प्रस्तुत किए जाने पर दूसरे अभिभावक की सहमति के अभाव में भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।
कोर्ट ने पासपोर्ट प्राधिकरण को बिना देरी रिद्धम (बच्चे) का पासपोर्ट जारी करने के निर्देश दिए।
📡 स्रोत: NewsData.io