विदेश

एक से बढ़कर एक हथियार से भारत को लैस कर रहा रूस, SU-57 के बाद अब T-72 टैंक की बारी

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 14 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
एक से बढ़कर एक हथियार से भारत को लैस कर रहा रूस, SU-57 के बाद अब T-72 टैंक की बारी

1970 के दशक का अंत हो गया है। जब भारतीय सेना के बेड़े में सोवियत संघ से एक ऐसा लड़ाकू बख्तरबंद सिपाही शामिल होता है भारत में जिसने भारत की जमीनी सरहदों पर अभेद दीवार खड़ी कर दी। नाम T72। राजस्थान के धधकते थार मरुस्थल से लेकर पूर्वी लद्दाख की 15,000 फीट ऊंची 0 डिग्री वाली बर्फीली चोटियों तक।

इस बख्तरबंद दैत्य ने दशकों तक पाकिस्तान और चीन के मंसूबों को धूल चटाए रखी। लेकिन आधुनिक युद्ध का मैदान अब बदल चुका है। यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि सिर्फ भारी भरकम लोहा काफी नहीं होता है। अगर टैंक के पास आधुनिक आंखें, तेज दिमाग और सटीक सुरक्षा कवच ना हो तो वह दुश्मन के एक सस्ते ड्रोन का शिकार भी बन सकता है।

ठीक इसी ऐतिहासिक मोड़ पर एक बार फिर भारत के दोस्त रूस से एक ऐसी कूटनीतिक और सामरिक हलचल उठी है जिसने नई दिल्ली और वैश्विक रक्षा गलियारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। रूस की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक टेक निर्माता कंपनी ने खुले तौर पर भारत के सामने साझेदारी की पेशकश कर दी है। रूस का पैगाम बिल्कुल साफ है कि भारत अपने पुराने T72 टैंकों को अपग्रेड करना चाहता है तो रूस हर संभव तकनीकी मदद देने के लिए तैयार है और वो भी भारत की अपनी जमीन पर यानी मेक इन इंडिया के तहत।

अब सवाल उठता है कि रूस के इस प्रस्ताव के पीछे असली रणनीति क्या है?

रूस की सबसे बड़ी टैंक निर्माता कंपनी उराल वागोन जावोट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ एलेक्जेंडर पोतापो ने मीडिया से बातचीत में खुलासा किया कि दोनों पक्षों के बीच इस बात को लेकर बातचीत और प्राथमिक तैयारियां चल रही हैं कि भारत के विशाल T72 बेड़े को कैसे आधुनिक तकनीक से लैस किया जाएगा।

अभी तक भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक या औपचारिक आवेदन यानी कि ऑफिशियल रिक्वेस्ट हमारे पास नहीं आया। अगर दोनों देशों के बीच शीर्ष सरकारी स्तर पर सहमति बनती है तो रूस अपनी संपूर्ण तकनीकी एक्सपर्टीज के साथ यानी विशेषता के साथ सहयोग करने को तैयार है। इस पूरे बयान के दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू है जिन पर गहराई से हमें ध्यान देने की जरूरत है।

पहला पहलू है नो ऑफिशियल रिक्वेस्ट येट। जी हां, रूस ने यह साफ कर दिया है कि यह प्रस्ताव अभी बातचीत के स्तर पर है। भारत ने अपने विकल्प खुले रखे हैं और जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं लिया है। आखिर भारत को अपने T72 टैंकों के आधुनिकीकरण की जरूरत क्यों पड़ गई?

रूस अच्छे से जानता है कि अब 1980 या 1990 का दौर नहीं है जब भारत सिर्फ विदेशी कारखानों से सीधे हथियार खरीदता था। पोतापोब ने खुद तमिलनाडु के हैवी व्हीकल फैक्ट्री यानी एचवीएफ का जिक्र किया। यानी रूस समझ चुका है कि अगर सौदा होता है तो वो भारत की शर्तों पर होगा और काम भारत की जमीन पर ही होगा।

संख्या के लिहाज से देखें तो भारतीय सेना की बख्तरबंद ताकत दुनिया की सबसे बड़ी विशाल आम ताकतों में से एक है। हमारी कोर के पास आधुनिक T90s भीष्म अत्याधुनिक T90 एमएस और स्वदेशी अर्जुन एमबीटी मौजूद है। लेकिन रीड की हड्डी आज भी सोवियत मूल के लगभग 2400 T72 अजय टैंक ही हैं। जब भारत ने इन्हें शामिल किया था तब यह अपने समय के सबसे आधुनिक टैंक में से एक था।

मगर पिछले चार दशकों में टैंक विरोधी तकनीकों में जमीन आसमान का फर्क आ चुका है। हालिया युद्धों ने यह साबित कर दिया, प्रमाणित कर दिया कि आधुनिक युद्ध क्षेत्र में एक टैंक को जीवित रहने के लिए नाइट विज़न और हंटर किलर क्षमता कैबिलिटी बहुत जरूरी है। पुराने T72 में रात के समय लक्ष्य साधने की क्षमता बहुत सीमित थी।

📡 स्रोत: NewsData.io

📰 पूरी खबर पढ़ें (NewsData.io पर जाएं)

💡 पृष्ठभूमि (Background)

रूस द्वारा भारत को T‑72 टैंक से लैस करने की खबर, SU‑57 के बाद, भू-राजनीतिक और सैन्य संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह विषय भारत के बख्तरबंद बल को आधुनिक बनाने और क्षेत्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के प्रयास को दर्शाता है। यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि T‑72, 1970 के दशक का क्लासिक टैंक, आज भी भारत की सीमा रक्षा में प्रमुख भूमिका निभा रहा है, और इसकी तैनाती से भारत की रणनीतिक संतुलन पर असर पड़ेगा। आम जनता पर इसका असर बढ़ी हुई रक्षा क्षमताओं के साथ-साथ रक्षा बजट में संभावित बदलाव और सेना की तैयारियों

J
JKS News Desk

वॉयस ऑफ क्रांति की संपादकीय टीम आपके लिए भोपाल, मध्यप्रदेश और देश की सटीक और विश्वसनीय समाचार प्रस्तुत करती है।