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बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत पर प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने जताई चिंता, स्वास्थ्य सेवाओं में तत्काल सुधार की मांग

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 14 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत पर प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने जताई चिंता, स्वास्थ्य सेवाओं में तत्काल सुधार की मांग

नई दिल्ली, 14 सितंबर 2026। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में संक्रामक बीमारियों के कारण 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत की खबर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह त्रासदी दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण, पोषण और बीमारियों की निगरानी व्यवस्था में गंभीर कमियों को सामने लाती है। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल, संवेदनशील और निरंतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की जरूरत बताई।

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि कुछ गांवों में बच्चों की मौत के बाद ही मेडिकल सुविधाएं पहुंचने की खबर बेहद चिंताजनक है। आशा कार्यकर्ताओं के रिक्त पदों, मेडिकल स्टाफ की कमी और समय पर इलाज नहीं मिलने की स्थिति को उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच पर गंभीर सवाल बताया। उन्होंने कहा कि बालाघाट में आशा कार्यकर्ताओं के 72 पद रिक्त बताए गए हैं, जिनमें 48 बिरसा ब्लॉक में हैं।

उन्होंने इस पूरे मामले की पारदर्शी समीक्षा की जरूरत बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल जिम्मेदारी तय करना नहीं, बल्कि यह समझना भी होना चाहिए कि स्वास्थ्य व्यवस्था कहां कमजोर रही और ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।

उन्होंने आदिवासी परिवारों के पारंपरिक या आस्था आधारित उपचार पर निर्भर रहने के लिए उन्हें दोष देने से भी आगाह किया। उनका कहना है कि जब औपचारिक स्वास्थ्य सेवाएं दूर हों, पर्याप्त मेडिकल स्टाफ उपलब्ध न हो या उपचार आसानी से सुलभ न हो, तो लोग स्वाभाविक रूप से उन तरीकों और व्यवस्थाओं का सहारा लेते हैं जिन पर उन्हें भरोसा होता है। ऐसे में समाधान परिवारों को दोष देना नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करना है जो उनके घर तक पहुंचे, उनका सम्मान करे और समुदाय का भरोसा हासिल करे।

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने मध्यप्रदेश सरकार से स्वास्थ्य अधिकारियों, स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज संगठनों को साथ लेकर विशेष आदिवासी बाल स्वास्थ्य मिशन शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इसके तहत घर-घर स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण, पोषण सहायता, संक्रामक बीमारियों की शुरुआती पहचान तथा गंभीर रूप से बीमार बच्चों को तत्काल स्वास्थ्य केंद्रों तक रेफर करने की व्यवस्था की जा सकती है।

उन्होंने गांव स्तर पर प्रशिक्षित स्थानीय महिलाओं, सामुदायिक स्वयंसेवकों, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जोड़कर अर्ली वॉर्निंग नेटवर्क बनाने का सुझाव भी दिया। यह नेटवर्क बुखार, खसरा, दस्त या बच्चों की असामान्य मौतों जैसी घटनाओं की जानकारी समय रहते स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है, ताकि संभावित संक्रमण को गंभीर रूप लेने से पहले नियंत्रित किया जा सके।

उन्होंने दूर-दराज के गांवों में तय कार्यक्रम के अनुसार मोबाइल मेडिकल टीमों के नियमित दौरे और गंभीर रूप से बीमार बच्चों को बिना देरी स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय आपातकालीन परिवहन व्यवस्था विकसित करने की जरूरत भी बताई।

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि सरकार अकेले हर स्तर पर काम नहीं कर सकती। नागरिक समाज संगठनों को केवल आलोचना तक सीमित रहने के बजाय जहां सहयोग की आवश्यकता हो, वहां प्रशासन और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य जागरूकता, टीकाकरण के लिए लोगों को जुटाने, पोषण संबंधी सहायता और सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य निगरानी में सहयोग की इच्छा जताई।

उन्होंने बालाघाट में हुई मौतों के आंकड़ों की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा की मांग करते हुए मध्यप्रदेश सरकार से दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक कसौटी यह नहीं है कि किसी त्रासदी के बाद कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दी जाती है, बल्कि यह है कि खतरे में पड़े बच्चे तक स्वास्थ्य सेवा कितनी जल्दी पहुंचती है। बच्चों की मौत को ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करने की वजह बनना चाहिए, जो अधिक मजबूत, सुलभ और मानवीय हो।

💡 पृष्ठभूमि (Background)

मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की संक्रामक रोगों से मृत्यु ने स्वास्थ्य सेवाओं में गंभीर खामियों को उजागर किया। यह विषय आदिवासी क्षेत्रों की स्वास्थ्य अवसंरचना, टीकाकरण और पोषण की कमी पर केंद्रित है। खबर का महत्व इसलिए है क्योंकि यह दूरदराज के समुदायों में चिकित्सा सुविधा और रोग निगरानी के अभाव को सामने लाती है, जिससे नीतिगत बदलाव की मांग बढ़ती है। आम जनता पर इसका असर यह है कि इससे स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ेगी, सरकार पर दबाव बढ़ेगा और भविष्य में ऐसे त्रासदियों को रोकने के

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।