बस्तर दशहरा: 75 दिन का अनूठा उत्सव, न रावण दहन न रामलीला
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अक्टूबर 23, नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा मनाने की परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग है। यहां दशहरे पर न तो रावण के पुतले का दहन होता है और न ही रामलीला का आयोजन किया जाता है। इसके बजाय, मां दंतेश्वरी की आराधना के साथ करीब 75 दिनों तक चलने वाला पारंपरिक उत्सव मनाया जाता है।
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता इसमें आदिवासी समुदायों की सक्रिय भागीदारी है। रथ निर्माण से लेकर लकड़ी और रस्सियों की व्यवस्था तक, अलग-अलग समुदायों को विशिष्ट जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं। किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासी विजय रथ खींचने की परंपरा निभाते हैं।
इस उत्सव का संबंध बस्तर के शाही वंश और महाराजा पुरुषोत्तम देव से भी जुड़ा है। इसकी शुरुआत हरियाली अमावस्या से होती है, जबकि मुरिया दरबार के साथ इसका पारंपरिक समापन होता है।
बस्तर दशहरा आस्था और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ आदिवासी परंपराओं तथा सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है।