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बस्तर दशहरा: 75 दिन का अनूठा उत्सव, न रावण दहन न रामलीला

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 23 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
बस्तर दशहरा: 75 दिन का अनूठा उत्सव, न रावण दहन न रामलीला

अक्टूबर 23, नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा मनाने की परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग है। यहां दशहरे पर न तो रावण के पुतले का दहन होता है और न ही रामलीला का आयोजन किया जाता है। इसके बजाय, मां दंतेश्वरी की आराधना के साथ करीब 75 दिनों तक चलने वाला पारंपरिक उत्सव मनाया जाता है।

बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता इसमें आदिवासी समुदायों की सक्रिय भागीदारी है। रथ निर्माण से लेकर लकड़ी और रस्सियों की व्यवस्था तक, अलग-अलग समुदायों को विशिष्ट जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं। किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासी विजय रथ खींचने की परंपरा निभाते हैं।

इस उत्सव का संबंध बस्तर के शाही वंश और महाराजा पुरुषोत्तम देव से भी जुड़ा है। इसकी शुरुआत हरियाली अमावस्या से होती है, जबकि मुरिया दरबार के साथ इसका पारंपरिक समापन होता है।

बस्तर दशहरा आस्था और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ आदिवासी परंपराओं तथा सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।