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बैतूल की पारंपरिक गडमल दाल को मिली राष्ट्रीय पहचान, विलुप्त होती फसल के संरक्षण को किसानों का सम्मान

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 7 नवंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
बैतूल की पारंपरिक गडमल दाल को मिली राष्ट्रीय पहचान, विलुप्त होती फसल के संरक्षण को किसानों का सम्मान

बैतूल जिले के भीमपुर ब्लॉक के बटकी गांव से शुरू हुई गडमल की दाल को बचाने की मुहिम अब राष्ट्रीय पहचान तक पहुंच गई है। कभी आदिवासी परिवारों की परंपरा और देवकाज का अहम हिस्सा रही यह पारंपरिक दलहनी फसल धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी। जिले के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक डॉ. रामकिशोर दयाराम पंवार ने वर्ष 2007 से लगातार समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से गडमल की दाल के विलुप्त होने का मुद्दा उठाया।

उनकी पुस्तक ‘मेरा बेतूल’ में दर्ज जानकारी ने कृषि वैज्ञानिकों का ध्यान इस दुर्लभ फसल की ओर आकर्षित किया। इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र बैतूल बाजार ने इसके संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की पहल की। अब भारत सरकार के पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण ने इस फसल को संरक्षण प्रदान किया है।

आगामी 12 नवंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित समारोह में बैतूल के तीन किसानों और दो कृषि वैज्ञानिकों को कम्युनिटी अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। इसके साथ ही फसल के संरक्षण और संवर्धन में योगदान देने वाले किसानों को कुल 10 लाख रुपए की सम्मान राशि प्रदान की जाएगी।

बैतूल बाजार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के तत्कालीन निदेशक डॉ. विजय कुमार वर्मा ने गडमल की दाल के संरक्षण का बीड़ा उठाया। इस तरह दस्तावेजों और इतिहास के पन्नों से गायब हो चुकी फसल को दोबारा पहचान दिलाने की पहल शुरू हुई।

कृषि विज्ञान केंद्र ने इसके संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन पर काम शुरू किया। इसके लिए किसानों की समिति गठित कर बीजों के नमूने यानी जर्मप्लाज्म एकत्र किए गए और जांच के लिए नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली भेजे गए। मार्च 2024 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित शोधपत्र में गडमल को बैतूल की विशिष्ट पारंपरिक फसल के रूप में दर्ज किया गया।

वैज्ञानिक परीक्षण में गडमल के बीजों में 23.8 प्रतिशत प्रोटीन और 19.3 प्रतिशत डाइटरी फाइबर पाया गया है। डाइटरी फाइबर ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने और खराब कोलेस्ट्रॉल कम करने में मददगार होता है। इसके गुण काफी हद तक उड़द से मिलते-जुलते हैं, हालांकि स्थानीय लोगों के अनुसार यह उड़द की तुलना में हल्की और पचने में आसान होती है। आदिवासी परिवार इससे दाल, वड़े और रोटी बनाते हैं। इसके आटे से तैयार व्यंजनों को धार्मिक और पारंपरिक अनुष्ठानों में देवी-देवताओं को प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है।

बाईट:--डॉ विजय वर्मा( पूर्व कृषि वैज्ञानिक)

बाईट:--डॉ एस के तिवारी( निदेशक एवं वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक बैतूल बाजार)

बाईट:--डॉ रामकिशोर पवार(पुस्तक लेखक एम समाजसेवी)

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💡 पृष्ठभूमि (Background)

बैतूल जिले के भीमपुर ब्लॉक के बटकी गांव में उगने वाली पारंपरिक गडमल दाल, जो एक बार आदिवासी परिवारों के आहार और धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा थी, धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर थी। डॉ. रामकिशोर दयाराम पंवार की पत्रकारिता और जागरूकता से इस फसल को राष्ट्रीय पहचान मिली, जिससे संरक्षण के प्रयास तेज हुए। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाती है कि किस प्रकार स्थानीय कृषि परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत, मीडिया और सार्वजनिक समर्थन से बचाई जा सकती हैं। आम जनता के लिए यह प्रेरणा है कि पारंपरिक फसलों का

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।