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भारत में युवाओं के लिए स्वरोजगार: बेरोजगारी की चुनौती बन रहा अवसर

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 2 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, जहाँ औसत आयु 28 वर्ष के करीब है। इतनी बड़ी युवा शक्ति संसाधन के रूप में तो है, मगर इसका सदुपयोग तभी हो सकता है जब उन्हें रोजगार मिले। सरकारी और निजी क्षेत्र में नौकरियों की कमी के दौर में स्वरोजगार ही एकमात्र रास्ता बनकर उभर रहा है।

कौशल विकास और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रयासों से युवाओं में उद्यमिता की भावना जग रही है। मगर सवाल यह है कि क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं? क्या हमारी शिक्षा प्रणाली युवाओं को वास्तविक दुनिया के लिए तैयार कर रही है?

स्वरोजगार के माध्यम से खुद के व्यवसाय खोलने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, मगर इसके साथ ही चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। क्या देश की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि ये स्व-निर्मित उद्यम टिक सकें? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब ढूँढना ही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

भारत में बेरोजगारी की गहराती विफलता: क्यों है युवाओं के लिए स्वरोजगार जरूरी?

भारत में बेरोजगारी दर पिछले कुछ वर्षों में स्थिर होकर 7-8% के आसपास बनी हुई है, मगर युवाओं के लिए यह दर काफी ज्यादा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के आँकड़ों के अनुसार, 15-29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 10% से ऊपर है।

सरकारी नौकरियों की कमी और निजी क्षेत्र में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को निराश किया है। इसी बीच, स्वरोजगार एक ऐसा विकल्प बनकर उभरा है जहाँ व्यक्ति खुद अपने लिए रोजगार का सृजन कर सकता है। फूड स्टॉल, ऑनलाइन स्टोर, कंटेंट क्रिएशन, ट्यूशन देने जैसे छोटे-छोटे व्यवसाय आज युवाओं के लिए जीवन रेखा बन गए हैं।

मगर स्वरोजगार के रास्ते में आने वाली बाधाएँ भी कम नहीं हैं। वित्तीय संसाधनों की कमी, मार्केटिंग की समझ की कमी और सरकारी योजनाओं तक पहुँच की कमी जैसी समस्याएँ अक्सर उद्यमियों को पीछे धकेल देती हैं।

स्टार्टअप इंडिया, प्रधानमंत्री रोजगार निर्मिति कार्यक्रम जैसी सरकारी योजनाओं के बावजूद, स्वरोजगार करने वालों में से अधिकांश को सफलता नहीं मिल पाती। इसका एक बड़ा कारण है कौशल विकास की कमी।

भारतीय शिक्षा प्रणाली आज भी रट्टा मारने और परीक्षा केंद्रित पढ़ाई पर ज्यादा जोर देती है, जिससे युवाओं में व्यावहारिक कौशल की कमी रह जाती है। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सुधार हुए हैं, मगर गैर-तकनीकी क्षेत्रों में कौशल विकास की गति बहुत धीमी है।

इसके अलावा, बैंकिंग व्यवस्था भी छोटे उद्यमियों को आसानी से ऋण देने में हिचकिचाती है, जिससे उनके व्यवसाय को शुरुआत में ही झटका लगता है।

बेरोजगारी का मूल कारण: शिक्षा, आर्थिक संरचना और सामाजिक मानसिकता

भारत में बेरोजगारी के मूल में शिक्षा प्रणाली की खामियाँ सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं। स्कूल और कॉलेजों से निकलने वाले लाखों छात्र ऐसे होते हैं जिन्हें नौकरी के लिए तैयार नहीं किया जाता।

नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NSDC) के आँकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग 1.2 करोड़ युवा रोजगार योग्य बनते हैं, मगर उनमें से केवल 5% ही कौशल विकास कार्यक्रमों से जुड़ते हैं। इसका मतलब है कि बाकी 95% युवाओं के पास न तो कौशल है, न ही नौकरी।

शिक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत है जहाँ व्यावहारिक ज्ञान, उद्यमिता और तकनीकी कौशल को प्राथमिकता दी जाए। आर्थिक संरचना भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है। बड़े उद्योगों और कंपनियों में नौकरियों की कमी के कारण युवाओं को छोटे व्यवसायों की ओर रुख करना पड़ रहा है।

मगर छोटे व्यवसायों को टिकाऊ बनाने के लिए आर्थिक सहायता, बाजार तक पहुँच और तकनीक की कमी जैसी चुनौतियाँ सामने आती हैं। इसके अलावा, सामाजिक मानसिकता भी एक बड़ी बाधा है। समाज में आज भी उद्यमिता को नौकरी न मिलने की मजबूरी से जोड़ा जाता है, न कि एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में देखा जाता है।

इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है जहाँ युवाओं को जोखिम उठाने और नई चीजें आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

स्वरोजगार और स्टार्टअप संस्कृति: एकमात्र समाधान या और भी विकल्प हैं?

भारत में स्वरोजगार और स्टार्टअप संस्कृति आजादी के बाद के सबसे बड़े सकारात्मक बदलावों में से एक है। पहले जहाँ सरकारी नौकरियों को ही सफलता का पैमाना माना जाता था, वहीं आज युवाओं में उद्यमिता की भावना बढ़ रही है।

स्टार्टअप इंडिया जैसे अभियानों ने न केवल युवाओं को प्रोत्साहित किया है, बल्कि विदेशी निवेशकों का भी ध्यान आकर्षित किया है। 2023 में भारत में 1.2 लाख से ज्यादा स्टार्टअप पंजीकृत हुए थे, जो वैश्विक स्तर पर चौथा सबसे बड़ा आँकड़ा था।

मगर इनमें से अधिकांश स्टार्टअप लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते, जिसका मुख्य कारण है बाजार की समझ की कमी और वित्तीय संसाधनों की कमी। इसके अलावा, सरकारी नौकरियों की कमी को पूरा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) में भर्तियाँ बढ़ाई जानी चाहिए।

सरकार को चाहिए कि वह बड़े स्तर पर कौशल विकास कार्यक्रम चलाए और युवाओं को तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान भी प्रदान करे। स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि बैंकिंग व्यवस्था सरल और सुलभ हो, जहाँ छोटे उद्यमियों को आसानी से ऋण मिल सके।

इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में भी उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जहाँ रोजगार के अवसर सीमित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: क्या स्वरोजगार वास्तव में बेरोजगारी का स्थायी समाधान हो सकता है? उत्तर: स्वरोजगार निश्चित रूप से बेरोजगारी का एक बड़ा समाधान है, मगर इसे स्थायी बनाने के लिए सरकार, शिक्षा प्रणाली और समाज तीनों को मिलकर काम करना होगा।

स्वरोजगार से न केवल व्यक्तिगत सफलता मिलती है, बल्कि इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं। मगर इसके लिए जरूरी है कि युवाओं को सही मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता और बाजार तक पहुँच मिले। प्रश्न: सरकार द्वारा चलाए जा रहे कौशल विकास कार्यक्रम कितने प्रभावी हैं?

उत्तर: सरकार द्वारा चलाए जा रहे कौशल विकास कार्यक्रम जैसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) और स्टार्टअप इंडिया ने काफी हद तक युवाओं को लाभ पहुँचाया है। मगर इसके बावजूद, अधिकांश युवा इन कार्यक्रमों से जुड़ नहीं पाते। कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ाने और उन्हें और अधिक व्यावहारिक बनाने की जरूरत है।

इसके अलावा, निजी क्षेत्र को भी इन कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए ताकि युवाओं को उद्योग जगत की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित किया जा सके।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।