भरतपुर के 200 साल पुराने चामुंडा माता मंदिर में अटूट आस्था
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सेवर रोड के जसवंत नगर में स्थित मंदिर से जुड़ी हैं कई मान्यताएं, नवरात्र में नौ दिन होती है विशेष पूजा-अर्चना और जागरण
भरतपुर, 13 अक्टूबर। राजस्थान के भरतपुर में आस्था और विश्वास की एक ऐसी तस्वीर देखने को मिलती है, जहां सड़क से गुजरने वाले वाहन चालक भी अपने आप गति धीमी कर लेते हैं और जसवंत नगर स्थित चामुंडा माता मंदिर के सामने श्रद्धा से शीश नवाते हैं। सेवर रोड पर स्थित इस प्राचीन मंदिर को स्थानीय लोग करीब 200 साल पुराना बताते हैं।
मंदिर के प्रति लोगों की आस्था इतनी गहरी है कि यहां से गुजरने वाली बसों के चालक भी माता को प्रणाम करना नहीं भूलते। कोई वाहन रोककर दर्शन करता है तो कोई अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही सिर झुकाकर आगे बढ़ जाता है। नवरात्र के दिनों में मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और पूरा परिसर भक्तिमय माहौल में नजर आता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, चामुंडा माता के इस मंदिर की स्थापना को लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रमुख मान्यता यह है कि माता यहां स्वयं प्रकट हुई थीं। इसके बाद स्थानीय लोगों और उनके पूर्वजों ने इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है।
इसी आस्था के चलते स्थानीय निवासियों के साथ दूर-दराज से गुजरने वाले लोग भी मंदिर में माथा टेकते हैं। मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश बताते हैं कि मंदिर से लोगों की आस्था लंबे समय से जुड़ी हुई है। उन्होंने बताया कि करीब 30 से 40 साल पहले मंदिर को हटाने की योजना बनाई गई थी। उस दौरान मंदिर को तोड़ने के लिए मिस्त्री लगाए गए, लेकिन काम के दौरान एक मिस्त्री छत से नीचे गिर गया।
इसके बाद मंदिर तोड़ने का काम रोक दिया गया। पुजारी के अनुसार, तत्कालीन जिला कलेक्टर ने बाद में मंदिर की मरम्मत करवाकर उसे दोबारा दुरुस्त कराया था। स्थानीय लोग इस घटना को भी मंदिर से जुड़ी आस्था और मान्यताओं के संदर्भ में याद करते हैं।
मंदिर की खास पहचान यहां से गुजरने वाले वाहन चालकों की श्रद्धा भी है। पुजारी ओमप्रकाश के मुताबिक, बस चालक अक्सर मंदिर के सामने वाहन की गति धीमी कर लेते हैं। कई चालक कुछ देर रुककर माता के दर्शन करते हैं, जबकि कुछ चलते वाहन से ही शीश नवाकर आगे बढ़ जाते हैं। यात्रा पर निकलते समय या मंदिर के सामने से गुजरते हुए माता का नाम लेना और सुरक्षित सफर की कामना करना यहां के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।
इस तरह मंदिर सड़क से गुजरने वाले यात्रियों के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मंदिर में मन्नत मांगने और उसके पूरा होने पर चढ़ावा अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है। श्रद्धालु परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य, संतान की खुशहाली और संकटों से मुक्ति की कामना लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं।
मन्नत पूरी होने पर कोई प्रसाद चढ़ाता है तो कोई घंटा अर्पित करता है। मंदिर में श्रद्धालुओं की ओर से अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अन्य चढ़ावे चढ़ाने की परंपरा भी है।
श्रद्धालु मान्यता ने बताया कि करीब एक साल पहले उनके बेटे के साथ गंभीर हादसा हो गया था। उस मुश्किल समय में उन्होंने माता चामुंडा से बेटे के स्वस्थ होने की मनौती मांगी थी और उसके ठीक होने पर मंदिर में घंटा चढ़ाने का संकल्प लिया था। बेटे के ठीक होने के बाद उन्होंने मंदिर पहुंचकर घंटा अर्पित किया। वह पिछले छह-सात साल से मंदिर में आती रही हैं और बेटे के स्वस्थ होने को माता की कृपा मानती हैं। उनके अनुसार, मंदिर में आने से उन्हें मानसिक शांति और संबल मिलता है।
सामान्य दिनों में भी मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नवरात्र के दौरान यहां विशेष रौनक देखने को मिलती है। नौ दिनों तक माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भजन-कीर्तन और जागरण के आयोजन होते हैं, जिनमें आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु भाग लेते हैं। परिवार के साथ मंदिर पहुंचने वाले भक्त माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि, धन-धान्य और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
जसवंत नगर का यह प्राचीन मंदिर धार्मिक मान्यताओं, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं और श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रतीक बना हुआ है। सड़क से गुजरते वाहनों के धीमे पड़ते पहिए और माता के सामने झुकते सिर इस बात की गवाही देते हैं कि समय के साथ मंदिर के प्रति लोगों की आस्था आज भी कायम है।
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