देश

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बुनियादी ढाँचे की कमियाँ, डिजिटल खाई और व्यापक सुधार की आवश्यकता

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 8 नवंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति

किसी भी राष्ट्र की प्रगति, समृद्धि और भविष्य की दिशा उसकी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े युवा कार्यबल वाले देशों में से एक है, लेकिन हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश क्षमता तब तक साकार नहीं हो सकती जब तक प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुलभ न हो। वर्तमान समय में हमारी शिक्षा व्यवस्था कई स्तरों पर गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। स्कूलों में छात्रों का नामांकन बढ़ाना एक उपलब्धि अवश्य है, परंतु सीखने के स्तर और वास्तविक कौशल विकास के पैमाने पर अभी भी एक लंबा सफर तय करना बाकी है।

सरकारी स्कूलों की स्थिति और सीखने की गुणवत्ता का संकट

देश के अधिकांश ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में सरकारी विद्यालय ही जनसामान्य के लिए शिक्षा का प्राथमिक साधन हैं। हालांकि, वर्षों से इन विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी देखी गई है। कई प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में समुचित कक्षाओं, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं तथा बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं का अभाव है। इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति शिक्षकों की रिक्तियों और उनकी अनुपस्थिति की है। एक शिक्षक के भरोसे कई कक्षाओं का संचालन होना सामान्य बात बन चुकी है, जिसका सीधा और प्रतिकूल प्रभाव बच्चों की नींव पर पड़ता है।

विभिन्न स्वतंत्र सर्वेक्षणों और अध्ययनों से लगातार यह तथ्य सामने आता रहा है कि प्राथमिक कक्षाओं के अनेक छात्र अपनी कक्षा के अनुरूप बुनियादी पाठ पढ़ने या सरल अंकगणित हल करने में सक्षम नहीं हैं। परीक्षा प्रणाली का झुकाव केवल रटंत विद्या और अंक प्राप्त करने पर केंद्रित हो गया है, जिससे तार्किक सोच और रचनात्मकता का हनन होता है। निजी स्कूलों की महँगी शिक्षा आम आदमी की पहुँच से बाहर है, जिसके कारण समाज में एक गंभीर शैक्षिक विभाजन पैदा हो रहा है।

डिजिटल विभाजन और आधुनिक संसाधनों की असमानता

हाल के वर्षों में शिक्षण व्यवस्था में तकनीक और डिजिटल माध्यमों का उपयोग तेजी से बढ़ा है, जिसे आधुनिक युग की अनिवार्य आवश्यकता माना जा रहा है। परंतु इस तकनीकी बदलाव ने 'डिजिटल डिवाइड' यानी तकनीकी असमानता को भी उजागर किया है। संपन्न परिवारों के बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं, कंप्यूटर और इंटरनेट का लाभ उठाकर आगे बढ़ रहे हैं, जबकि ग्रामीण पृष्ठभूमि और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे इन संसाधनों के अभाव में मुख्यधारा से पिछड़ रहे हैं।

डिजिटल शिक्षा केवल स्मार्ट कक्षाएँ या मोबाइल फोन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए शिक्षकों का तकनीकी प्रशिक्षण और क्षेत्रीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण सामग्री का निर्माण भी आवश्यक है। बिजली की अनियमित आपूर्ति और इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी के चलते आधुनिक तकनीक का लाभ देश के अंतिम छोर तक नहीं पहुँच पा रहा है। यदि समय रहते इस खाई को नहीं पाटा गया, तो तकनीक शिक्षा को समावेशी बनाने के बजाय असमानता बढ़ाने का नया औजार बन जाएगी।

नीतिगत सुधार और व्यावहारिक क्रियान्वयन की राह

शिक्षा प्रणाली में वास्तविक और टिकाऊ बदलाव लाने के लिए केवल नई नीतियों की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन और बजटीय आवंटन की आवश्यकता है। सार्वजनिक शिक्षा पर जीडीपी का अनुपात बढ़ाना, शिक्षक भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना तथा शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करना अनिवार्य कदम हैं। इसके साथ ही, पाठ्यक्रम को केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित न रखकर व्यावहारिक कौशल, व्यावसायिक प्रशिक्षण और समस्या-समाधान क्षमता से जोड़ना होगा, ताकि भारत की भावी पीढ़ी आत्मनिर्भर और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बन सके।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: भारत में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए सबसे प्राथमिक कदम क्या होना चाहिए?

उत्तर: सबसे प्राथमिक कदम प्राथमिक स्तर पर बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक कौशल को मजबूत करना है। इसके लिए योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, नियमित प्रशिक्षण और विद्यालयों में बुनियादी भौतिक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।

प्रश्न: डिजिटल शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती क्या है?

उत्तर: ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, निर्बाध बिजली तथा डिजिटल उपकरणों की अनुपलब्धता सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा शिक्षकों में तकनीकी ज्ञान की कमी और क्षेत्रीय भाषाओं में उपयुक्त डिजिटल सामग्री का अभाव भी प्रमुख समस्या है।

M
Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।