भोपाल - खामोशी को हौसलों की आवाज देकर गौरांशी ने रचा इतिहास, डेफलिंपिक्स में स्वर्ण और एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में जीता रजत
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“आशा निकेतन की शान है, गौरांशी उसका नाम है।” यह पंक्ति गौरांशी शर्मा के संघर्ष, हौसले और उपलब्धियों को बखूबी बयां करती है। सुनने और बोलने की क्षमता नहीं होने के बावजूद गौरांशी ने अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है।
गौरांशी का जीवन आशा निकेतन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बधिरों के लिए से गहराई से जुड़ा रहा है। उनके माता-पिता भी इसी विद्यालय के विद्यार्थी रहे हैं। परिवार को विश्वास था कि विद्यालय शिक्षा के साथ बच्चों में आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास भी विकसित करता है। इसी भरोसे के साथ गौरांशी को यहां शिक्षा दिलाई गई।
बचपन से सामने आई चुनौतियों के बावजूद माता-पिता ने उन्हें कभी कमजोर महसूस नहीं होने दिया। शिक्षकों ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दिए। पढ़ाई के साथ खेलों में रुचि बढ़ी और बैडमिंटन गौरांशी की पहचान बन गया। कोर्ट पर गौरांशी के लिए उनका खेल ही अभिव्यक्ति का माध्यम बना।
जहां दूसरे खिलाड़ी आवाज और निर्देश सुनकर खेलते हैं, वहीं उन्होंने अपनी दृष्टि, एकाग्रता, अनुशासन और लगातार अभ्यास को अपनी ताकत बनाया। कठिन प्रशिक्षण के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित करने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं। डेफलिंपिक्स में स्वर्ण पदक
वर्ष 2022 में ब्राजील के काशियास दो सुल में आयोजित 24वें समर डेफलिंपिक्स में गौरांशी ने भारतीय मिक्स्ड टीम बैडमिंटन स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय टीम ने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल कर स्वर्ण पदक जीता। यह पदक गौरांशी की मेहनत के साथ उनके परिवार, शिक्षकों और विद्यालय के विश्वास की भी जीत थी।
उनकी उपलब्धि ने मध्यप्रदेश और देश को गौरवान्वित किया। एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में रजत गौरांशी ने वर्ष 2024 में मलेशिया में आयोजित 10वें एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। बैडमिंटन टीम स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने रजत पदक अपने नाम किया।
स्वर्ण के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रजत पदक जीतकर गौरांशी ने अपनी निरंतरता और खेल प्रतिभा का परिचय दिया। यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट गौरांशी की उपलब्धियों का दायरा खेल के मैदान से भी आगे बढ़ चुका है। अक्टूबर 2023 में वह यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट बनीं।
अब वे समावेशन, समावेशी शिक्षा और हर बच्चे के खेलने के अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर काम कर रही हैं। गौरांशी का उद्देश्य उन बच्चों के लिए अवसर और विश्वास की आवाज बनना है, जिन्हें दिव्यांगता या संसाधनों की कमी के कारण आगे बढ़ने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
गौरांशी की कहानी सिर्फ पदक जीतने की कहानी नहीं, बल्कि समाज की सोच बदलने की कहानी भी है। उन्होंने साबित किया कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी शारीरिक चुनौती से नहीं, बल्कि उसके साहस, प्रतिभा और उपलब्धियों से होती है। उनकी सफलता उन माता-पिता के लिए उम्मीद है, जिनके बच्चे किसी शारीरिक चुनौती के साथ जीवन जी रहे हैं।
साथ ही यह शिक्षकों और समाज के लिए संदेश है कि यदि बच्चों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें सही अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए, तो वे असंभव लगने वाली मंजिलों को भी हासिल कर सकते हैं। गौरांशी सुन और बोल नहीं सकतीं, लेकिन उनके हौसलों की आवाज आज पूरी दुनिया तक पहुंच रही है।