भोपाल

भोपाल में कुत्तों का ‘राज’, इंसान बेबस! मासूम बच्चों को बनाया शिकार, मजदूर नगर में दहशत—गली किसकी, हुकूमत किसकी?

लेखक: Aazam Lala अंतिम अपडेट: 29 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
भोपाल में कुत्तों का ‘राज’, इंसान बेबस!  मासूम बच्चों को बनाया शिकार, मजदूर नगर में दहशत—गली किसकी, हुकूमत किसकी?

शाहजहानाबाद करोंद डी आई जी सड़क पर रात मे कुत्ते करते है अटैक भोपाल। शहर में आवारा कुत्तों का आतंक अब महज़ परेशानी नहीं, बल्कि आम आदमी की हिफाज़त से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है।

शाहजहानाबाद के मजदूर नगर में पिछले दो दिनों से मासूम बच्चों को कुत्तों द्वारा काटे जाने की शिकायतों ने इलाके के रहवासियों की फिक्र बढ़ा दी है।

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बच्चे घर से निकलें तो डर, बुजुर्ग रास्ते पर निकलें तो डर और दोपहिया वाहन चालक सड़क पर चलें तो पीछे दौड़ते कुत्तों का खौफ!

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नगर निगम का ‘कुत्ता प्रबंधन’—इधर से पकड़ा, उधर छोड़ दिया! रहवासियों का कहना है कि शिकायतों के बाद नगर निगम की टीम कुत्तों को पकड़ती है, लेकिन अगर उन्हें एक इलाके से उठाकर दूसरे इलाके में छोड़ दिया जाए तो सवाल उठना लाज़मी है— क्या समस्या का इलाज किया जा रहा है या सिर्फ उसका पता बदला जा रहा है?

आज एक मोहल्ले से कुत्ते उठे, कल दूसरे मोहल्ले में झुंड नजर आने लगे। नतीजा यह कि जिस इलाके के लोग कल परेशान थे, आज किसी दूसरे इलाके के लोग उसी परेशानी का सामना कर रहे हैं।

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‘पशु प्रेम’ अपनी जगह, मगर इंसानी जान भी अनमोल है! जानवरों से मोहब्बत करना अच्छी बात है। बेजुबानों के लिए खाना-पानी और इलाज का इंतजाम होना भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पशु प्रेम और इंसानी सुरक्षा के बीच कोई संतुलित रास्ता नहीं निकाला जा सकता?

अगर किसी रिहायशी इलाके में कुत्तों के झुंड लोगों पर हमला करने लगें, बच्चों को काटने की घटनाएं सामने आएं और राहगीरों के लिए सड़क पर निकलना मुश्किल हो जाए, तो जिम्मेदार महकमे को तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं करनी चाहिए?

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इंसान और जानवर—दोनों की हिफाज़त जरूरी है। कुत्तों के लिए भी ‘आशियाना’, शहर के लिए भी राहत कुत्तों को पीटकर या मारकर समस्या खत्म करना किसी भी सूरत में स्थायी हल नहीं है। जरूरत है कि प्रशासन वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करे।

ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है जहां कुत्तों के लिए खाने-पानी, इलाज, नसबंदी और देखभाल का इंतजाम हो तथा रिहायशी इलाकों में उनके झुंड बनने की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण रखा जाए। सवाल सिर्फ मजदूर नगर का नहीं, पूरे भोपाल का है! आज मजदूर नगर में बच्चे खौफ में हैं, कल शहर के किसी और इलाके में यही तस्वीर दिखाई दे सकती है।

सड़क पर चलते इंसान के पीछे दौड़ता कुत्ता और उससे बचने की कोशिश करता वाहन—यह महज़ एक दृश्य नहीं, बल्कि हादसे को दावत देता खतरा है। कई बार सड़क पर अचानक कुत्तों के आ जाने से वाहन चालकों के लिए मुश्किल हालात पैदा हो जाते हैं। ऐसे में सवाल सीधा है—

अगर रिहायशी इलाकों में आवारा कुत्तों के झुंड बढ़ते जा रहे हैं, तो उनकी निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी आखिर किस महकमे की है? अब जनता पूछ रही है—अगला शिकार कौन? मासूम बच्चों को काटे जाने के बाद भी अगर जिम्मेदार महकमा सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित रहा, तो रहवासियों की फिक्र और बढ़ना स्वाभाविक है।

पशु प्रेम जरूरी है, लेकिन इंसानी जिंदगी की हिफाज़त भी उतनी ही जरूरी है। भोपाल की जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, कारगर इंतजाम और स्थायी समाधान चाहती है। सवाल वही है—कुत्तों की हिफाज़त कौन करेगा, यह व्यवस्था बताएगी; लेकिन इंसानों की हिफाज़त कौन करेगा, इसका जवाब जिम्मेदारों को देना होगा।

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Aazam Lala

आज़म लाला भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो लंबे समय से जनसमस्याओं और सामाजिक मुद्दों को अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाते हैं। वे जमीनी स्तर की खबरों और जनसरोकार से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाते हैं।