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भ्रामराम्बा, रक्षा शक्ति का रूप:साल में एक दिन देवी के चेहरे से हटता है सोने का कवच, पुजारी साड़ी पहनकर करता है विशेष आरती

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 18 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
भ्रामराम्बा, रक्षा शक्ति का रूप:साल में एक दिन देवी के चेहरे से हटता है सोने का कवच, पुजारी साड़ी पहनकर करता है विशेष आरती

आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में देवी भ्रामराम्बा की आठ हाथों वाली महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा है। देवी के चेहरे पर सोने का मुख-कवच रहता है। साल में चैत्र महीने में होने वाले कुंभोत्सव पर एक दिन यह कवच हटता है। तब लोगों को देवी के वास्तविक चेहरे के दर्शन होते हैं। नल्लमाला के जंगलों में रहने वाले चेंचू आदिवासी देवी को अपनी बेटी और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को अपना दामाद मानते हैं।

यहां नवरात्रि में नौ दिन रोज दो से दस साल की बच्चियों को देवी मानकर पूजा जाता है। रात में सुहागिन महिलाओं की विशेष पूजा होती है। देवी की उत्सव प्रतिमा हर शाम नवदुर्गा के अलग रूप में सजती है। उसी दौरान मल्लिकार्जुन और भ्रामराम्बा की संयुक्त शोभायात्रा निकलती है। दशहरे पर देवी अपने मूल भ्रामराम्बा रूप में दर्शन देती हैं।

एक ही परिसर में ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ, मल्लिकार्जुन के पीछे भ्रामराम्बा का मंदिर भ्रामराम्बा मंदिर आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में श्रीशैलम की नल्लमाला पहाड़ियों पर है। यहां मल्लिकार्जुन का ज्योतिर्लिंग और भ्रामराम्बा का शक्तिपीठ एक ही परिसर में हैं। दोनों के गर्भगृह अलग हैं। मल्लिकार्जुन मंदिर के पीछे देवी का मंदिर है।

यह जगह 12 ज्योतिर्लिंगों और 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है। शक्तिपीठ की मान्यता के अनुसार, यहां सती की गर्दन का हिस्सा गिरा था। श्रीशैलम बस स्टैंड से मंदिर करीब 2 किमी, मार्कापुर रोड रेलवे स्टेशन से 85 किमी और कुर्नूल एयरपोर्ट से लगभग 180 किमी दूर है। स्टेशन और आसपास के शहरों से बस और टैक्सी मिलती हैं।

मंदिर की अधिकृत वेबसाइट पर दर्शन और विशेष पूजा की ऑनलाइन बुकिंग होती है। आठ भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी के रूप में देवी; गर्भगृह के सामने श्रीचक्र की पूजा मंदिर के गर्भगृह में देवी की आठ भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा है। यह पत्थर से बनी है। देवी खड़ी हैं और बाएं पैर से महिषासुर को दबाए हुए हैं।

एक हाथ से असुर को पकड़कर दूसरे हाथ के त्रिशूल से उसका वध करती दिखाई देती हैं। बाकी हाथों में तलवार, खंजर, गदा, धनुष और ढाल जैसे हथियार हैं। कंधे पर बाण रखने का तरकश भी बना है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने देवी के इस उग्र स्वरूप को शांत करने के लिए गर्भगृह के सामने मुखमंडप में पत्थर का श्रीचक्र स्थापित किया।

श्रीचक्र में नौ त्रिकोण हैं। इनमें चार सीधे और पांच उल्टे बने हैं। चार त्रिकोण शिव और पांच शक्ति के प्रतीक हैं। ये एक-दूसरे को काटते हुए 43 छोटे त्रिकोण बनाते हैं। इनके बीच एक बिंदु है, जिसे देवी की मूल शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस श्रीचक्र की नवरात्रि में विशेष पूजा होती है। भौंरों की माला पहनती हैं भ्रामरी देवी, गर्भगृह के पीछे भौंरों की आवाज सुनाई देने की मान्यता देवी भागवत के दसवें स्कंध में भ्रामरी देवी के हाथों में काले भौंरों और गले में भौंरों से घिरी माला का वर्णन है।

ये भौंरे देवी के चारों ओर 'ह्रीं' मंत्र की ध्वनि करते हैं। इसी रूप में देवी ने असंख्य भौंरे पैदा कर अरुणासुर का वध कराया था। श्रीशैलम में देवी के गर्भगृह के पीछे पत्थर की एक छोटी दरार से भौंरों जैसी आवाज सुनाई देने की मान्यता है। श्रद्धालु इसे भ्रामरी नाद कहते हैं। हालांकि आवाज का वास्तविक स्रोत प्रमाणित नहीं है।

यहां देवी की मूल प्रतिमा आठ भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी के रूप में है, भौंरे के आकार में नहीं। साल में एक दिन देवी के चेहरे से हटता है सोने का कवच, पुजारी साड़ी पहनकर करता है विशेष आरती देवी की आठ भुजाओं वाली पत्थर की प्रतिमा का चेहरा आम दिनों में सोने के मुख-कवच से ढका रहता है। देवी का श्रृंगार रेशमी वस्त्र, सोने के आभूषण और फूलों से होता है।

साल में केवल चैत्र महीने के कुंभोत्सव पर यह कवच हटाकर देवी के वास्तविक स्वरूप के दर्शन कराए जाते हैं। इस साल 7 अप्रैल को पहले बंद दरवाजों के पीछे देवी की एकांत पूजा हुई। इसके बाद करीब 25 हजार कद्दू, 5 हजार नारियल और एक लाख नींबू की सात्विक बलि दी गई। शाम को मल्लिकार्जुन शिवलिंग का अन्नाभिषेक कर गर्भगृह के दरवाजे बंद किए गए।

देवी के सामने करीब 200 किलो चावल का कुंभ बनाया गया। फिर मंदिर के एक पुरुष पुजारी ने साड़ी पहनकर देवी की विशेष कुंभ आरती की। इसके बाद देवी का स्वर्ण मुख-कवच हटाकर श्रद्धालुओं को उनके वास्तविक चेहरे के दर्शन कराए गए। इसे निजरूप दर्शन कहते हैं। नौ दिन कन्या पूजा, शिव-शक्ति के अलग यज्ञ; दशहरे पर शमी पूजा और नौका उत्सव श्रीशैलम में नवरात्रि के नौ दिन रोज दो से दस साल की बच्चियों को देवी मानकर फूल, फल और नए कपड़े दिए जाते हैं।

रात में विवाहित महिलाओं की सुवासिनी पूजा होती है। नवरात्रि में देवी के लिए श्रीचक्र की नवावरण पूजा, कुमकुम अर्चन और चंडी यज्ञ होते हैं। शिव के लिए रुद्र हवन होता है। दोनों को महानैवेद्य चढ़ता है। शाम को देवी की उत्सव प्रतिमा को नवदुर्गा के अलग-अलग रूपों में सजाकर शिव-पार्वती की यात्रा निकलती है।

रात में सुवासिनी पूजा के साथ देवी की आरती होती है। अष्टमी से दशहरे तक तीन दिन खास 18 अक्टूबर को महाअष्टमी पर देवी का महागौरी श्रृंगार होगा। रात में शिव-पार्वती की उत्सव प्रतिमाएं नंदी वाहन पर निकलेंगी। 19 अक्टूबर को महानवमी पर सिद्धिदात्री रूप में देवी की पूजा होगी। आंध्र प्रदेश सरकार दोनों देवताओं को रेशमी वस्त्र अर्पित करेगी।

रात में कैलास वाहन पर यात्रा होगी। 20 अक्टूबर को विजयादशमी पर देवी अपने मूल भ्रामराम्बा स्वरूप में दर्शन देंगी। इस दिन चंडी और रुद्र यज्ञ की पूर्णाहुति, कलश पूजा का समापन और शस्त्र पूजा होगी। शाम को शमी के पेड़ की पूजा के बाद शिव-पार्वती की उत्सव प्रतिमाओं को लक्ष्मीनरसिंह मंदिर के पास जलकुंड में सजी नाव पर घुमाया जाएगा।

इसी नौका उत्सव के साथ दस दिन का दशहरा महोत्सव समाप्त होगा। चेंचू आदिवासी देवी को बेटी और शिव को दामाद मानते हैं श्रीशैलम के नल्लमाला जंगलों में रहने वाले चेंचू आदिवासियों की लोककथा के अनुसार, भगवान शिव यहां शिकार करने आए थे। इस दौरान उन्हें चेंचू समुदाय की एक युवती से प्रेम हुआ और दोनों ने विवाह कर लिया।

इसी वजह से चेंचू समाज भ्रामराम्बा देवी को अपने परिवार की बेटी और मल्लिकार्जुन को दामाद मानता है। शिव को यहां चेंचू मल्लैया भी कहते हैं। इस रिश्ते के कारण चेंचू समुदाय की मंदिर की रथयात्रा और दूसरी धार्मिक सेवाओं में भाग लेने की पुरानी परंपरा है। जनवरी 2023 में मंदिर प्रशासन ने मल्लिकार्जुन और भ्रामराम्बा के कल्याणोत्सव यानी प्रतीकात्मक विवाह में 250 चेंचू परिवारों को विशेष रूप से बुलाकर सम्मान दिया था।

📡 स्रोत: NewsData.io

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