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BHU अस्पताल में 56 साल पुराना ड्रेनेज सिस्टम:अब अंदर-बाहर के नालों का बनेगा एक नेटवर्क, कैंपस में 185 रिचार्ज पिट, फिर भी अस्पताल में पानी

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 28 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
BHU अस्पताल में 56 साल पुराना ड्रेनेज सिस्टम:अब अंदर-बाहर के नालों का बनेगा एक नेटवर्क, कैंपस में 185 रिचार्ज पिट, फिर भी अस्पताल में पानी

25 अगस्त को 119.8 मिमी बारिश के बाद बीएचयू अस्पताल परिसर में तीन से चार फीट तक पानी भर गया। मरीजों और तीमारदारों को पानी के बीच से होकर ओपीडी और इमरजेंसी तक पहुंचना पड़ा।

नगर निगम 386 छोटे-बड़े नालों की सफाई पूरी होने का दावा कर चुका है, इसके बावजूद बीएचयू समेत शहर के कई हिस्सों में जलभराव ने जलनिकासी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब बीएचयू और नगर निगम ने परिसर के साथ शहर के बाहरी नालों को जोड़कर स्थायी समाधान के लिए साझा मास्टर प्लान तैयार करने पर सहमति जताई है।

बारिश ने फिर दिखाई जलनिकासी की हकीकत 25 अगस्त की सुबह 8:30 बजे तक पिछले 24 घंटे में वाराणसी में 119.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। तेज बारिश के बाद बीएचयू परिसर का अस्पताल क्षेत्र जलमग्न हो गया। अस्पताल परिसर में तीन से चार फीट तक पानी भरने से मरीजों, बुजुर्गों और तीमारदारों को परेशानी उठानी पड़ी।

कई लोगों को पानी के बीच से होकर ओपीडी और इमरजेंसी तक पहुंचना पड़ा। 26 अगस्त को भी बारिश का दौर जारी रहा। जलभराव वाले स्थानों से पानी निकालने के लिए नगर निगम की टीमें लगाई गईं।

इससे यह सवाल फिर सामने आया कि जब बारिश से पहले शहर के नालों की सफाई का दावा किया गया था, तो इतनी बड़ी मात्रा में पानी जमा होने के बाद उसकी निकासी तेजी से क्यों नहीं हो सकी?

बीएचयू के पानी की निकासी बाहर के नालों पर निर्भर बीएचयू के अनुसार परिसर से बरसाती पानी सीर गेट, नरिया गेट और ट्रॉमा सेंटर की ओर से नगर निगम के नालों में जाता है। यानी परिसर की जलनिकासी केवल अंदर बने नेटवर्क पर निर्भर नहीं है, बल्कि बाहर के नालों की क्षमता और उनकी स्थिति भी अहम है।

बीएचयू का कहना है कि नगर निगम के नालों में बैकफ्लो होने पर परिसर का पानी बाहर निकलने के बजाय रुक जाता है। ऐसे में केवल परिसर के नालों की सफाई पर्याप्त नहीं है।

बाहरी नालों की क्षमता, उनके आउटफॉल और पानी की निकासी की दिशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 185 रिचार्ज पिट, फिर भी अस्पताल में पानी बीएचयू परिसर में बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने के लिए 185 रिचार्ज पिट बनाए गए हैं।

विश्वविद्यालय के अध्ययन के मुताबिक भवनों की छतों से करीब 4,14,876 वर्गमीटर क्षेत्र का पानी एकत्र किया जा सकता है। इससे लगभग 1,33,200 घनमीटर पानी प्राप्त होने का अनुमान है।

इतनी बड़ी रेनवाटर हार्वेस्टिंग क्षमता और रिचार्ज पिट होने के बावजूद अस्पताल परिसर में तीन से चार फीट पानी भरना बताता है कि समस्या सिर्फ बारिश के पानी को रोकने की नहीं, बल्कि अतिरिक्त पानी को समय पर बाहर निकालने की भी है। 386 नालों की सफाई के बाद भी सवाल कायम नगर निगम की ओर से 386 छोटे-बड़े नालों की सफाई पूरी किए जाने का दावा किया गया है।

इसके बावजूद 25 अगस्त की बारिश में बीएचयू सहित शहर के कई इलाकों में जलभराव हुआ। इससे साफ है कि नाला सफाई जलनिकासी की पूरी समस्या का समाधान नहीं है। यदि नालों की क्षमता बारिश के दौरान आने वाले पानी के मुकाबले कम है या उनका जुड़ाव सही तरीके से नहीं है, तो सफाई के बावजूद पानी जमा हो सकता है।

इसी तरह आउटफॉल पर दबाव या बैकफ्लो होने की स्थिति में परिसर और शहर के निचले हिस्सों में पानी रुक सकता है। बीएचयू के अध्ययन में पहले ही सामने आ चुकी है कमजोरी बीएचयू के 2022 के अध्ययन में वाराणसी के स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज नेटवर्क को कमजोर और पर्याप्त रूप से आपस में जुड़ा नहीं बताया गया था।

अध्ययन में यह भी संकेत दिया गया था कि तेज बारिश के दौरान पुराने सीवर नेटवर्क के इस्तेमाल से बैकफ्लो की स्थिति पैदा हो सकती है। यानी बारिश के दौरान समस्या केवल नालों में कचरा या गाद भरने की नहीं है।

असली चुनौती यह है कि बारिश का पानी किस रास्ते से कितनी तेजी से आगे बढ़ेगा, नालों की क्षमता कितनी है और अंतिम आउटफॉल तक पानी बिना रुकावट पहुंच पा रहा है या नहीं। अब बीएचयू-नगर निगम मिलकर बनाएंगे मास्टर प्लान जलभराव की समस्या को लेकर बीएचयू और नगर निगम के बीच बातचीत हुई है।

दोनों संस्थान अब परिसर और उससे जुड़े बाहरी नालों को एक साथ देखते हुए जलनिकासी की स्थायी योजना तैयार करने पर सहमत हुए हैं। प्रस्तावित मास्टर प्लान में यह तय करना जरूरी होगा कि बीएचयू परिसर का पानी किस दिशा में निकलेगा, किन नालों से जुड़ेगा और उन नालों की क्षमता कितनी होनी चाहिए।

साथ ही नगर निगम के नालों से परिसर की ओर होने वाले बैकफ्लो को रोकने की स्थायी व्यवस्था भी करनी होगी। वाराणसी में व्यापक स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज योजना की कवायद पहले भी सामने आती रही है।

ऐसे में अब चुनौती यह होगी कि नई योजना पुराने प्रयासों से कितनी अलग और व्यावहारिक होती है और उसे जमीन पर लागू करने के लिए कितनी समयसीमा और कितना बजट तय किया जाता है।

बूढ़े हो चुके ड्रेनेज सिस्टम पर तनते गए नए-नए भवन बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल में मरीजों की सुविधाओं के लिए नए-नए भवन बनते गए, लेकिन बारिश के पानी की निकासी का इंतजाम 56 साल पुराना ही है। यानी नाले पर लोड बढ़ा, लेकिन इसका वैकल्पिक मार्ग नहीं तलाशा गया, जिससे हर साल बारिश में अस्पताल परिसर तालाब जैसा दिखने लगता है।

आईआईटी बीएचयू के रिटायर सिविल इंजीनियर ने बताया कि करीब 1970 में अस्पताल की पुरानी ओपीडी बिल्डिंग बनी थी। उसी समय ड्रेनेज सिस्टम भी बना।

📡 स्रोत: NewsData.io

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