बिहार में गोवा के दूधसागर वॉटरफॉल जैसा नजारा:160ft के ककोलत से 80m ऊंचे तेल्हार कुंड तक, 5 वॉटरफॉल्स जहां जाने से खुद को रोक नहीं पाएंगे
बिहार की पहचान अक्सर ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के साथ गंगा नदी से जोड़कर देखी जाती है। लेकिन दक्षिण बिहार के कैमूर और रोहतास की पहाड़ियों से लेकर नवादा तक कई खूबसूरत जलप्रपात हैं, जो बारिश के मौसम में बेहद आकर्षक नजर आते हैं। पहाड़ों के बीच से गिरती पानी की धार, चारों ओर हरियाली और जंगलों का शांत नजारा इन जगहों को खास बनाता है। अगर आप मानसून में बिहार में ही किसी खूबसूरत और शांत जगह पर घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो ककोलत वॉटरफॉल, तेल्हार कुंड, धुआं कुंड, मंजर कुंड, तुतला भवानी, कर्कटगढ़ और काशिश झरना आपके लिए अच्छे विकल्प हो सकते हैं। बिहार के 5 ऐसे खूबसूरत जलप्रपातों के बारे में जानिए, जहां एक बार जाने का मन जरूर करेगा... 1. ककोलत वॉटरफॉल- 160 फीट की ऊंचाई से गिरता है पानी नवादा का ककोलत वॉटरफॉल राज्य के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। यह बिहार-झारखंड बॉर्डर के पास ककोलत पहाड़ी पर स्थित है। नवादा से यह करीब 33 किलोमीटर दूर है। यहां झरने का पानी करीब 150 से 160 फीट की ऊंचाई से नीचे गिरता है और तलहटी में प्राकृतिक रूप से एक वॉटरपूल बन जाता है। चारों ओर हरे-भरे जंगल और पहाड़ इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते हैं। ककोलत की खासियत इसका ठंडा पानी है। जिला प्रशासन के अनुसार, यहां का पानी सालभर ठंडा रहता है। बारिश के मौसम में हरियाली और झरने का बहाव बढ़ने से इसकी खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, जून से अगस्त के बीच यहां घूमने का अच्छा समय है। यहां तक कैसे पहुंचें नवादा से सड़क मार्ग के जरिए ककोलत पहुंचा जा सकता है। जिला प्रशासन के अनुसार नवादा बस स्टैंड से फतेहपुर मोड़ और अकबरपुर होते हुए यह करीब 43 किलोमीटर की दूरी पर है। क्या है इसकी मान्यता ककोलत का पौराणिक महत्व भी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में एक राजा को एक ऋषि के श्राप के कारण अजगर का रूप धारण करना पड़ा था। मान्यता है कि वनवास के दौरान पांडव यहां पहुंचे थे और इसी दौरान उस राजा को श्राप से मुक्ति मिली। चैत संक्रांति के अवसर पर यहां मेले का आयोजन भी किया जाता है। एक पर्यटक चंदन ने बताया, “मैं बारिश के मौसम में गया से यहां घूमने आया हूं। पहले यहां चेंजिंग रूम की सुविधा नहीं थी और खाने-पीने की भी व्यवस्था नहीं थी। यहां घूमने के लिए पैसे भी नहीं लगते थे, लेकिन जैसे-जैसे सुविधाएं बढ़ी हैं, अब शुल्क भी लिया जाने लगा है।” 2. तेलहर कुंड- पहाड़ियों के बीच गिरता झरना कैमूर में स्थित तेलहर कुंड बिहार के खूबसूरत और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में शामिल है। कैमूर की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित यह वॉटरफॉल करीब 80 मीटर यानी लगभग 262 फीट की ऊंचाई से नीचे गिरता है। ऊंचाई से गिरते पानी की फुहारें और आसपास फैली हरियाली मानसून के दौरान यहां का नजारा बेहद शानदार बना देती हैं। तेलहर कुंड की एक खासियत यहां मौजूद प्राकृतिक जलस्रोत और कुंड है। बिहार पर्यटन के अनुसार, झरने का पानी नीचे स्थित तेलहर कुंड झील में गिरता है। यह पानी खरगड़ा (अधौरा) क्षेत्र से निकलने वाली सुवर्ण नदी और कई छोटी बरसाती पहाड़ी धाराओं से आता है। भारत के प्रसिद्ध जलप्रपातों की बात करें तो गोवा का दूधसागर, कर्नाटक का जोग फॉल्स और मेघालय का नोहकलिकाई फॉल्स अपनी ऊंचाई और विशालता के लिए मशहूर हैं। इनके मुकाबले तेलहर कुंड छोटा जरूर है, लेकिन इसकी प्राकृतिक खूबसूरती इसे बिहार के खास जलप्रपातों में जगह देती है। प्रसिद्ध मां मुंडेश्वरी मंदिर से पास है तेलहर कुंड तेलहर कुंड भभुआ से करीब 32KM और मोहनिया से करीब 47KM दूर है। यहां से करीब 28KM की दूरी पर प्रसिद्ध मां मुंडेश्वरी मंदिर भी है। पास में करमचट डैम होने के कारण टूरिस्ट को झरने के साथ पहाड़ी और पानी का खूबसूरत नजारा भी देखने को मिलता है। घूमने का सबसे अच्छा समय जून से अगस्त मानसून का मौसम सबसे बेस्ट समय माना जाता है। इस दौरान पहाड़ हरियाली से ढक जाते हैं और पानी की धाराएं भी बढ़ जाती है। हालांकि, पहाड़ी इलाके में जाने के दौरान फिसलन और तेज पानी से सावधानी बरतना जरूरी है। 3. धुआं कुंड पानी से उठता है धुएं जैसा कुहरा सासाराम से करीब 15KM दूर कैमूर की पहाड़ियों में स्थित धुआं कुंड बिहार के खूबसूरत नेचुरल टूरिस्ट स्पॉट में शामिल है। करीब 130 फीट की ऊंचाई से गिरता पानी जब चट्टानों और गहरी घाटी में पहुंचता है तो उससे उठने वाली धुंध और फुहारें दूर से धुएं जैसी दिखाई देती हैं। इसी खास नजारे के कारण इसका नाम धुआं कुंड रखा गया है। धुआं कुंड अकेला नहीं है। इसके आसपास मांझर कुंड भी स्थित है। कैमूर की पहाड़ियों से निकलने वाली जलधाराएं चट्टानों के बीच से गुजरते हुए मांझर कुंड तक पहुंचती है और आगे धुआं कुंड में गिरती हैं। दोनों झरने हरे-भरे जंगलों और पहाड़ी घाटियों से घिरे हैं, जिससे मानसून के दौरान यहां का नजारा बेहद खूबसूरत हो जाता है। यहां से खूबसूरत दिखता है सनराइज-सनसेट सनराइज और सनसेट के टाइम पानी पर पड़ती धूप की किरणें झरने को और खूबसूरत बना देती है। बिहार पर्यटन भी मानसून में यहां आने की सलाह देता है। यह जगह पिकनिक, फोटोग्राफी और नेचर लवर के लिए जरूरी है। सासाराम रेलवे स्टेशन से यहां पर आसानी से ऑटो से आ सकते हैं। सड़क से भी यह क्षेत्र जुड़ा हुआ है। धुआं कुंड के साथ मांझर कुंड और कैमूर की पहाड़ियों की प्राकृतिक खूबसूरती इसे बिहार के खास मानसूनी पर्यटन स्थलों में शामिल करती है। 4. मांझर कुंड पहाड़ और झरने के बीच पिकनिक स्पॉट मांझर कुंड की खूबसूरती को अगर सिर्फ वॉटरफॉल के रूप में नहीं, बल्कि उसके पूरे नेचुरल स्ट्रक्चर के रूप में देखें तो यह जगह काफी खास है। इसका ढांचा पहाड़ी चट्टानों, घाटियों, बहती जलधारा और हरियाली से मिलकर बना है। बिहार टूरिजम भी आसपास की घाटियों और चट्टानी फॉर्मेशन को इसकी खासियत बताता है। मांझर कुंड का स्ट्रक्चर कैसा है? मांझर कुंड कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित है। पहाड़ी इलाके से आने वाली जलधारा चट्टानों के बीच से घुमावदार रास्ते में आगे बढ़ती है और कई जगहों पर छोटे-छोटे कैस्केड बनाती हुई नीचे आती है। इस कारण यहां पानी का बहाव एक सीधी धार की जगह चट्टानों के बीच सीढ़ीनुमा और घुमावदार रूप में दिखाई देता है। इसके आसपास की चट्टानी बनावट, गहरी घाटियां और घना क्षेत्र मिलकर इसे नेचुरल एम्फीथिएटर जैसा नजारा देते हैं। मानसून में जब पहाड़ों से पानी की मात्रा बढ़ती है, तो यही स्ट्रक्चर झरने को और ज्यादा सुंदर बना देता है। बिहार पर्यटन के मुताबिक मानसून में यहां गिरता हुआ पानी कैस्केडिंग रूप में बेहद आकर्षक दिखाई देता है। ये जगह फोटोग्राफी के लिए बहुत ही खूबसूरत माना जाता है। मांझर कुंड की असली खूबसूरती उसकी ऊंचाई से ज्यादा उसके नेचुरल स्ट्रक्चर में है- पहाड़, चट्टान, घाटी, हरियाली और कई स्तरों पर बहता पानी इसे बिहार के खास मानसूनी झरनों में शामिल करते हैं। 5. तुतला भवानी झरने के साथ देवी मंदिर के दर्शन रोहतास का तुतला भवानी वॉटरफॉल नेचुरल सुंदरता के साथ धार्मिक आस्था का भी केंद्र है। यह ऊंची चट्टानों और घने जंगलों के बीच स्थित है। यहां मां तुतला भवानी का फेमस मंदिर भी है। वॉटरफॉल और मंदिर का एक साथ दिखना, इस नजारे को और भी खूबसूरत बनाता है। इस जगह को दूसरे टूरिस्ट स्पॉट से अलग बनाता है। बारिश के मौसम में पहाड़ियों पर हरियाली बढ़ जाती है और वॉटरफॉल का फ्लो भी तेज हो जाता है। 800 से 1200 साल पुरानी मान्यता तुतला भवानी मंदिर को करीब 800 से 1200 साल पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में कैमूर की पहाड़ियों की कंदराओं में मां की प्रतिमा दिखाई दी थी। कहा जाता है कि तत्कालीन राजा धवल प्रताप ने 19 अप्रैल 1158 को यहां मां की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। इसके बाद से यहां लगातार पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। श्रद्धालु इस स्थान को सिद्ध पीठ के रूप में मानते हैं। सालभर टपकती हैं ‘अमृत बूंदें’ मंदिर के ऊपर मौजूद चट्टान से सालभर पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। गर्मी हो या बारिश, चट्टान से बूंदों का गिरना लगातार जारी रहता है। श्रद्धालु इसे सामान्य पानी नहीं, बल्कि मां का आशीर्वाद और ‘अमृत बूंद’ मानते हैं। मंदिर के पुजारी नुनु बाबा और स्थानीय लोगों के अनुसार, इन बूंदों को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम मधेपुरा से पहुंचीं पर्यटक अर्चना कुमारी ने बताया, जितना इस जगह के बारे में सुना था, उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत यहां देखने को मिला। बिहार में इस तरह का वॉटरफॉल शायद ही कहीं और देखने को मिले। वहीं, एक अन्य पर्यटक रिया तिवारी ने कहा, यहां का नजारा देखकर वापस जाने का मन ही नहीं करता। प्रकृति की खूबसूरती और आस्था का ऐसा अद्भुत संगम है, जो एक बार आने के बाद बार-बार यहां आने के लिए मजबूर करता है। 6. कर्कटगढ़ मगरमच्छ का रहता है जमावड़ा कैमूर के चैनपुर प्रखंड में पहाड़ियों के बीच मौजूद कर्कटगढ़ वॉटरफॉल बिहार के सबसे अनोखे टूरिस्ट स्पॉट में शामिल है। उत्तर प्रदेश बॉर्डर के पास मौजूद ये झरना घने जंगल, चट्टानी पहाड़ियों और शांत वातावरण के बीच अपनी अलग खूबसूरती बिखेरता है। ये कैमूर वाइल्डलाइफ सैंच्यूरी का हिस्सा है। कर्कटगढ़ की सबसे खास पहचान इसका वाइड वॉटरफॉल और नीचे बनने वाला नेचुरल पुल हैं। बिहार पर्यटन के अनुसार यह झरना करीब 300 फीट चौड़ा और 100 फीट ऊंचा है। कर्मनाशा नदी की जलधारा चट्टानों पर गिरते हुए नीचे एक खूबसूरत वॉटरपुल बना देती है। मौसम के साथ इस पानी का रंग और रूप भी बदलता दिखाई देता है। कभी यहां का पानी नीला तो कभी हरा हो जाता है। बता दें कि कर्कटगढ़ को बिहार के दूसरे झरनों से अलग इसकी मगरमच्छों की आबादी बनाती है। यहां कर्मनाशा नदी के आसपास मगरमच्छों का आवास है। इसी वजह से कर्कटगढ़ को मगरमच्छ संरक्षण और इको-टूरिज्म के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मुगल शासक से यहां रहता है मगरमच्छ इस जगह का इतिहास भी दिलचस्प है। कभी मुगल शासक और बाद में ब्रिटिश अधिकारी यहां मगरमच्छों के शिकार और आसपास की खूबसूरती देखने आते थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने झरने का नजारा देखने के लिए यहां डाक बंगला भी बनवाया था। ब्रिटिश अधिकारी हेनरी रैमसे ने कर्कटगढ़ को सुंदर नेचुरल व्यू से घिरा बेहतरीन वॉटरफॉल बताया था। आज यहां वाइल्डलाइफ का शिकार बंद है। अगर ककोलत की पहचान ऊंचाई और प्राकृतिक कुंड, तेलहर की पहचान भव्य ऊंचाई, मांझर-धुआं कुंड की पहचान कैस्केड और पहाड़ी खूबसूरती है, तो कर्कटगढ़ की सबसे बड़ी पहचान है- झरना, जंगल, नदी और मगरमच्छों का अनोखा संगम... 7. कशिश वॉटरफॉल कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित कशिश वॉटरफॉल राज्य के सबसे खूबसूरत और कम चर्चित झरनों में से एक है। राजधानी पटना से यह करीब 170km दूर है। काशिश की सबसे बड़ी खासियत इसकी ऊंचाई है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार इसकी ऊंचाई लगभग 800 फीट है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां एक ही पहाड़ी से चार अलग-अलग जलधाराएं तीन दिशाओं में गिरती हुई दिखाई देती हैं। यही नेचुरल स्ट्रक्चर काशिश को बिहार के दूसरे झरनों से अलग बनाता है। झरने का पूरा इलाका कैमूर की पहाड़ियों की गहरी घाटियों और घने जंगलों से घिरा है। बारिश के दिनों में पहाड़ों पर हरियाली बढ़ जाती है और अलग-अलग दिशाओं से आने वाली जलधाराएं चट्टानों पर गिरते हुए कई स्तरों का खूबसूरत कैस्केड तैयार करती हैं। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे पहाड़ के बीच से कई सफेद धाराएं एक साथ नीचे उतर रही हों। काशिश का कंपैरिजन अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी से भी जोड़ा जाता है। बिहार पर्यटन के अनुसार, बारिश के मौसम में बिहार में 200 से अधिक झरना दिखाई देने का उल्लेख मिलता है और काशिश भी उन्हीं में शामिल है। यह जगह नेचर लवर्स और ट्रेकिंग पसंद करने वालों के लिए खास है। रोहतास वन विभाग के अनुसार काशिश से आगे पहाड़ों और जंगलों के रास्ते ट्रैकिंग करते हुए अकबरपुर, चौरासन मंदिर और रोहतासगढ़ किला की ओर जाया जा सकता है। बारिश में क्यों बढ़ जाती है इन झरनों की खूबसूरती? बिहार के ज्यादातर वॉटरफॉल कैमूर और रोहतास की पहाड़ी के आसपास बसे हैं। मानसून में बारिश का पानी पहाड़ियों से होकर नीचे आता है और छोटी-बड़ी वॉटर करंट में बदल जाता है। यही जलधाराएं कई जगहों पर झरने का रूप ले लेती है। बारिश के बाद पहाड़ियों पर हरियाली, चट्टानों से गिरता पानी और आसपास छाई धुंध इन जगहों को बेहद खूबसूरत बना देती है, इसलिए मानसून को इन वॉटरफॉल को देखने का सबसे आकर्षक समय माना जाता है। घूमने जाएं तो इन बातों का रखें ध्यान वॉटरफॉल जितने खूबसूरत हैं, बारिश के मौसम में उतने ही संवेदनशील और जोखिम भरे भी हो सकते हैं। अचानक पानी का बहाव बढ़ सकता है और चट्टानें फिसलन भरी हो सकती है। इसलिए झरने के तेज बहाव के बीच जाने या ऊंची चट्टानों के किनारे खड़े होकर फोटो लेने से बचना चाहिए। प्रशासन या स्थानीय लोगों की ओर से किसी क्षेत्र को प्रतिबंधित किया गया हो तो वहां जाने से बचें। बच्चों को अकेले पानी के पास न जाने दें और पहाड़ी रास्तों पर विशेष सावधानी बरतें।
📡 स्रोत: NewsData.io