BNSS की धारा 356 देती है न्याय की गारंटी, अपराधी को सजा निर्धारित करने, गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं
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आज मैं आपको भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की एक ऐसी धारा के बारे में बताने जा रहा हूं जो "न्याय के पहिए को रुकने नहीं देती"। पहले यदि अपराधी फरार हो जाए तो पूरा मुकदमा ही रुक जाता था। कई बार कुछ लोग 20-25 साल बाद पकड़े जाते थे। तब कोर्ट में मुकदमा शुरू भी करो तो कोई सजा नहीं मिल पाती थी क्योंकि गवाह घटना का विवरण तक भूल चुके होते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अपराधी की गिरफ्तारी हो या ना हो, गवाह की गवाही दर्ज कर ली जाएगी, सजा निर्धारित कर दी जाएगी और जब भी अपराधी पकड़ा जाएगा, निर्धारित सजा उस पर लागू हो जाएगी। मतलब यदि अब आरोपी फरार हुआ तो उसके वकील को कोर्ट में उसके खिलाफ गवाहों से जिरह (Cross-examination) करने का मौका तक नहीं मिलेगा। BNSS धारा 356: अभियुक्त की अनुपस्थिति में साक्ष्य का रिकॉर्ड किया जाना इस धारा को हम दो मुख्य परिस्थितियों (Sub-sections) में बांटकर समझेंगे: 1. पहली परिस्थिति: जब अभियुक्त 'फरार' हो [BNSS धारा 356(1)] कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति पर अपराध का आरोप है, लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बचने के लिए गायब हो गया है। शर्त (Condition): यदि न्यायालय को यह प्रमाणित कर दिया जाता है कि अभियुक्त फरार (Absconded) हो गया है और उसे तुरंत गिरफ्तार करने की कोई संभावना नहीं है। न्यायालय की शक्ति: ऐसी स्थिति में, वह न्यायालय जो उस अपराध की जांच या विचारण (Trial) के लिए सक्षम है, अभियोजन के गवाहों को बुला सकता है और उनके बयानों को लिखित रूप में दर्ज कर सकता है। बाद में उपयोग (Usage): यदि वह फरार व्यक्ति भविष्य में कभी गिरफ्तार होता है, तो इन दर्ज किए गए बयानों का उपयोग उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में किया जा सकता है। लेकिन यह केवल तभी होगा जब: साक्षी (गवाह) की मृत्यु हो चुकी हो, अथवा साक्षी साक्ष्य देने के लिए असमर्थ (Incapable) हो गया हो। पलायन कर गया हो। देश छोड़कर चला गया हो। साक्षी मिल न रहा हो या उसे अदालत लाना बहुत अधिक देरी, खर्च या असुविधा का कारण बने। 2. दूसरी परिस्थिति: जब अपराधी 'अज्ञात' हो और अपराध 'गंभीर' हो [धारा 356(2)] कभी-कभी ऐसा होता है कि एक बहुत बड़ा अपराध (जैसे हत्या) हो जाता है, लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चल पाता कि वह अपराध आखिर किया किसने है। शर्त: अपराध ऐसा होना चाहिए जो मृत्युदंड (Death) या आजीवन कारावास (Life Imprisonment) से दंडनीय हो। निर्देश (Direction): ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय (High Court) या सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) यह निर्देश दे सकते हैं कि प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट (Magistrate of the first class) उन व्यक्तियों की जांच करे जो उस अपराध के बारे में जानकारी रखते हैं। साक्ष्य की प्रासंगिकता: इन व्यक्तियों के बयान दर्ज कर लिए जाएंगे। यदि बाद में कोई व्यक्ति उस अपराध के लिए पकड़ा जाता है, तो इन बयानों का उपयोग उसके खिलाफ किया जा सकता है, बशर्ते वह साक्षी मर चुका हो या साक्ष्य देने के लिए उपलब्ध न हो। LAW विद्यार्थियों के लिए याद रखने योग्य 'गोल्डन रूल्स': इस धारा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समय बीतने के साथ गवाहों की याददाश्त धुंधली न हो जाए या उनकी मृत्यु हो जाने पर साक्ष्य पूरी तरह खत्म न हो जाएं। वीडियोग्राफी का महत्व: BNSS में आधुनिक तकनीकों पर जोर दिया गया है, इसलिए इन साक्ष्यों को रिकॉर्ड करते समय पारदर्शिता का पूरा ध्यान रखा जाता है। अनिवार्यता: यह धारा केवल तब लागू होती है जब अभियुक्त जानबूझकर न्याय से भाग रहा हो या अपराधी का पता ही न हो। निष्कर्ष: धारा 356(1) फरार अभियुक्त के लिए है और 356(2) अज्ञात अपराधी के लिए है। यह धारा सुनिश्चित करती है कि 'अपराधी भले ही भाग जाए, लेकिन साक्ष्य नहीं भागने चाहिए'। लेखक: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।
📡 स्रोत: NewsData.io