इतिहास

11 जुलाई 1995 बोस्निया नरसंहार: इतिहास के पन्नों से यूरोप के सबसे बड़े मुस्लिम जनसंहार की कहानी

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 14 अगस्त 2026 👁️ 38 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
11 जुलाई 1995 बोस्निया नरसंहार: इतिहास के पन्नों से यूरोप के सबसे बड़े मुस्लिम जनसंहार की कहानी

11 जुलाई 1995... यह वह तारीख़ है जिसे बोस्निया के मुसलमान कभी भूल नहीं सकते। इसी दिन बोस्निया के शहर स्रेब्रेनित्सा (Srebrenica) में यूरोप ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा जनसंहार देखा। विडंबना यह थी कि जिस शहर को संयुक्त राष्ट्र ने "सेफ एरिया" घोषित किया था, वहीं हजारों बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम कर दिया गया।

लेकिन यह नरसंहार अचानक नहीं हुआ था। इसकी शुरुआत कई साल पहले हो चुकी थी।

1992 में यूगोस्लाविया के टूटने के बाद बोस्निया ने आज़ादी का ऐलान किया। देश में तीन बड़े समुदाय थे—बोस्नियाक (मुस्लिम), सर्ब (ऑर्थोडॉक्स ईसाई) और क्रोएट (कैथोलिक ईसाई)। बोस्निया के सर्ब नेताओं ने स्वतंत्र बोस्निया को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका लक्ष्य था कि बोस्निया के बड़े हिस्से को "ग्रेटर सर्बिया" में मिला दिया जाए। इसके लिए उन्होंने उन इलाकों से मुसलमानों को पूरी तरह खत्म करने या भगा देने की नीति अपनाई, जिसे बाद में दुनिया ने "एथनिक क्लीनज़िंग" (जातीय सफाया) के नाम से जाना।

गांव जलाए गए, हजारों लोगों की हत्या हुई, महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुए और लाखों लोग अपने ही घरों से बेघर हो गए। दुनिया यह सब देखती रही।

पूर्वी बोस्निया का शहर स्रेब्रेनित्सा हजारों विस्थापित मुस्लिम परिवारों की आख़िरी पनाहगाह बन गया। हालात बिगड़ने पर संयुक्त राष्ट्र ने इसे "सेफ एरिया" घोषित किया और डच शांति सैनिकों (Dutchbat) को वहां तैनात किया गया। लोगों को भरोसा था कि अब वे सुरक्षित हैं।

लेकिन 11 जुलाई 1995 को बोस्नियाई सर्ब सेना के कमांडर रत्को म्लादिच अपनी फौज के साथ शहर में दाखिल हो गए। संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक उन्हें रोक नहीं सके। महिलाओं और बच्चों को अलग कर दिया गया, जबकि हजारों मुस्लिम पुरुषों और किशोर लड़कों को बसों और ट्रकों में भरकर अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया।

अगले कुछ दिनों में 8,000 से अधिक बोस्नियाई मुस्लिम पुरुषों और किशोरों की हत्या कर दी गई। उन्हें सामूहिक कब्रों में दफना दिया गया। बाद में सबूत मिटाने के लिए कई कब्रों को दोबारा खोदकर शव दूसरी जगहों पर फेंक दिए गए, ताकि अपराध छिपाया जा सके। वर्षों बाद डीएनए परीक्षण के जरिए हजारों लोगों की पहचान हो सकी।

इस नरसंहार की सबसे दर्दनाक बात सिर्फ़ इतनी नहीं थी कि हजारों लोग मारे गए। सबसे बड़ा सवाल यह था कि यह सब संयुक्त राष्ट्र की मौजूदगी में हुआ। जिन लोगों ने नीले हेलमेट वाले सैनिकों को अपनी सुरक्षा की आख़िरी उम्मीद समझा था, वे उनकी आंखों के सामने मौत के हवाले कर दिए गए। इसी कारण स्रेब्रेनित्सा को आज भी संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जाता है।

बाद में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICTY) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) दोनों ने इस घटना को जनसंहार (Genocide) माना। बोस्नियाई सर्ब नेता रत्को म्लादिच और रादोवान कराडज़िच को युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और जनसंहार का दोषी ठहराया गया।

11 जुलाई को हर वर्ष दुनिया भर में स्रेब्रेनित्सा के पीड़ितों को याद किया जाता है। यह दिन केवल बोस्निया के मुसलमानों के शोक का दिन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए यह याद दिलाने वाला दिन है कि जब नफ़रत को राजनीति का हथियार बना दिया जाता है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं समय पर अपना दायित्व नहीं निभा पातीं, तो इंसानियत कितनी बड़ी कीमत चुकाती है।

स्रेब्रेनित्सा का जनसंहार सिर्फ़ बोस्निया का इतिहास नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि किसी भी समाज में पहचान के आधार पर नफ़रत, यदि समय रहते नहीं रोकी जाए, तो वह अंततः जनसंहार का रूप भी ले सकती है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।