CEC ज्ञानेश कुमार पर SC की अवमानना केस चलाने की मांग, क्या है दलील?
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मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलाने की मांग. एक वकील ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि को चिट्ठी लिख कर अनुमति मांगी है.
वकील ब्रजेश सिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में दिए टी एन शेषन मामले के फैसले में चुनाव आयोग में 3 आयुक्तों की मौजूदगी को सही ठहराया था.
सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आयुक्तों की सहमति या बहुमत के आधार पर निर्णय लेने के लिए कहा था. ज्ञानेश कुमार के एकतरफा निर्णय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के विरुद्ध हैं.
क्यों जरूरी है सहमति?
कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट के प्रावधानों के तहत सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलाने के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल से सहमति लेनी जरूरी है. वकील ने अभी सिर्फ चिट्ठी भेजी है.
यह जरूरी नहीं है कि अटॉर्नी जनरल सहमति दें. यह भी जरूरी नहीं है कि अटॉर्नी जनरल को उनकी चिट्ठी का तुरंत जवाब देना होगा.
ये मांग ऐसे समय में की गई है, जब चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया पर आयोग के भीतर ही सवाल उठे हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने कई कदमों पर आपत्तियां जताई. इन आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया.
आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्त का पैनल कोई भी बड़ा फैसला लेता है.
एसवाई कुरैशी ने क्या कहा?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने पूरे विवाद पर कहा कि इलेक्शन कमीशन का इलेक्शन एक्ट है, उसमें बड़ा क्लियरली लिखा हुआ है कि इसके डिसीजन सर्व सम्मति से होने चाहिए जहां तक मुमकिन हो.
तीनों को बराबर के हक हैं. सर्व सम्मति से अगर फैसले नहीं हुए तो सारे फैसले गैर कानूनी हैं. पूरे डेढ़ साल में जो जो डिसीजन लिए गए हैं उसकी पूरी लिस्ट बनाई जाए. पब्लिक की जाए कि उनमें से कितने यूनानिमस थे.
अखबार के खुलासे के बाद से विपक्षी पार्टियां मुख्य चु
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलाने की मांग की खबर में वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल को चिट्ठी लिखकर अनुमति मांगी है। यह विषय चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और न्यायिक निरीक्षण के बीच के नाज़ुक संतुलन को दर्शाता है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि चुनावी प्राधिकरण पर कानूनी कार्रवाई संभव है, जिससे चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि चुनावी निर्णयों में अधिक निगरानी और जवाबदेही की माँग बढ़े, जिस