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'चंपत राय बेदाग-निष्कलंक, उनका भोलापन मुसीबत बना':सब पर विश्वास करके गलती की; महासचिव बनने के बाद गोविंद देव गिरि का पहला इंटरव्यू

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 4 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
'चंपत राय बेदाग-निष्कलंक, उनका भोलापन मुसीबत बना':सब पर विश्वास करके गलती की; महासचिव बनने के बाद गोविंद देव गिरि का पहला इंटरव्यू

‘चंपत राय बेदाग और निष्कलंक हैं। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। उनका भोलापन उनके लिए मुसीबत बन गया। उन्होंने सब पर विश्वास करके गलती की। लोगों की पहचान करने में उनसे चूक हुई।’ ‘ट्रस्ट के दायित्व निभाने में कुछ कमियां रही हैं। अगर कोई कमी नहीं होती तो चोरी कैसे हो सकती थी?

जहां कमी रही है, वहां सुधार किया जाएगा। चोरी करने वालों को सजा जरूर मिलनी चाहिए।’ ये बातें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के नए महासचिव गोविंद देव गिरि महाराज ने कहीं। जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने सबसे पहले दैनिक भास्कर से बात की। चढ़ावा चोरी से लेकर अपनी जिम्मेदारियों तक, हर सवालों का खुलकर जवाब दिया।

उन्होंने कहा- चढ़ावा चोरी के पीछे हमें कुछ षड्यंत्र नजर आता है। घटना हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, लेकिन पूरे घटनाक्रम को जिस तरह पेश किया गया, उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल: महासचिव के तौर पर आपकी तीन प्राथमिकता क्या होंगी? जवाब- पहली- यह मंदिर देव सेवा का केंद्र बने।

देश के मंदिरों के लिए राम मंदिर आदर्श बने। मंदिर की व्यवस्था से लोग प्रेरणा लेकर जाएं। दूसरी- व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी बनाना और तीसरी- अयोध्या के लोगों और मंदिर के बीच संवाद कैसे मजबूत हो। उनकी अपेक्षाओं और भावनाओं को कैसे समझा जाए। इसके लिए बेहतर संवाद व्यवस्था तैयार करना।

सवाल : अब तक ट्रस्ट में कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, अब महासचिव हैं। इसे किस तरह देखते हैं? जवाब- प्रभु अपने चरणों में मुझे कहीं भी रखें, मेरे लिए सब बराबर है। कोषाध्यक्ष के रूप में भी मुझे समय देना पड़ता था, लेकिन अब महासचिव के रूप में ज्यादा समय देना पड़ेगा। मुझे अपनी व्यवस्था थोड़ी बदलनी पड़ेगी।

प्रभु राम की सेवा के लिए जितना समय देना पड़ेगा, मैं दूंगा। मेरे लिए पद नहीं, रामलला की सेवा महत्वपूर्ण है। सवाल : महासचिव की जिम्मेदारी संभालने से पहले आपके मन में कोई संकोच था? जवाब- प्रभु राम की सेवा के लिए किसी तरह का संकोच नहीं होता। लेकिन, चिंता जरूर थी। पूरे साल मेरे कार्यक्रम पहले से निर्धारित रहते हैं।

महासचिव का दायित्व बड़ा है, इसलिए अब मुझे समय निकालकर अयोध्या आना पड़ेगा। सवाल यह था कि समय कैसे निकाल पाऊंगा। लेकिन, मैंने तय किया कि प्रभु राम के लिए समय निकालना ही है। सवाल : ट्रस्ट

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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