छत्तीसगढ़ का रहस्यमयी दंडकारण्य: एक अधर्म, महर्षि का श्राप और ‘दंड का वन’ बनने की अनसुनी गाथा
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वर्तमान छत्तीसगढ़ की पावन धरा का एक विशाल और प्राचीन भू-भाग पौराणिक काल में दंडकारण्य (Dandakaranya) के नाम से विख्यात था। रामायण और प्राचीन सनातन ग्रंथों में वर्णित यह अरण्य एक ऐसा रहस्यमयी क्षेत्र है, जिसके नाम से ही भय और अगाध आस्था की अनुभूति होती है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘दंडकारण्य’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है “दंड का जंगल” (The Forest of Punishment)।
परंतु छत्तीसगढ़ की यह भूमि हमेशा से घना और भयावह जंगल नहीं थी। प्राचीन काल में यह एक अत्यंत समृद्ध, विशाल और सुरम्य साम्राज्य हुआ करता था। फिर ऐसा क्या हुआ कि एक हंसता-खेलता राज्य रातों-रात राख में बदल गया और राक्षसों व भयानक जीवों का अड्डा बन गया? 1.
राजा दंड का अधर्म और मधुमंत राज्य का विनाश पौराणिक आख्यानों के अनुसार, सूर्यवंश के महान राजा इक्ष्वाकु (King Ikshvaku) के सबसे छोटे पुत्र का नाम दंड (King Danda) था। राजा इक्ष्वाकु ने अपने पुत्र दंड को विंध्याचल पर्वतों के दक्षिण में स्थित एक अति समृद्ध प्रदेश का राजा बनाया, जिसकी राजधानी मधुमंत (Madhumanta) थी। राजा दंड के गुरु दैत्यगुरु महर्षि शुक्राचार्य (Sage Shukracharya) थे। 2.
राक्षसी साम्राज्य का गढ़ और ऋषियों का संताप श्राप के कारण संपूर्ण मानव जाति का विनाश होने के बाद यह अरण्य राक्षसों (Demons/Rakshasas), पिशाचों और हिंसक वन्यजीवों का गढ़ बन गया। 3.
त्रेतायुग: जब दंडकारण्य पहुँचे श्रीराम भगवान श्रीराम (Lord Rama), माता सीता (Sita) और लक्ष्मण (Lakshmana) ने अपने 14 वर्षों के वनवास काल का सबसे लंबा समय (लगभग 10 से 11 वर्ष) इसी दंडकारण्य की सीमा के भीतर व्यतीत किया। दंडकारण्य की यह अनसुनी कथा यह संदेश देती है कि कैसे अधर्म, अहंकार और सत्ता के दुरुपयोग से एक समृद्ध साम्राज्य भी भस्म होकर ‘दंड का वन’ बन सकता है।
छत्तीसगढ़ की यह पावन भूमि केवल एक प्राचीन अरण्य नहीं, बल्कि न्याय, धर्म की स्थापना और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के दिव्य संकल्पों की अमर साक्षी है। The post छत्तीसगढ़ का रहस्यमयी दंडकारण्य: एक अधर्म, महर्षि का श्राप और ‘दंड का वन’ बनने की अनसुनी गाथा appeared first on See Positive .
📡 स्रोत: NewsData.io