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धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति पिछड़े वर्ग के अंतर्गत आरक्षण का स्वतः दावा नहीं कर सकते: सर्वोच्च न्यायालय

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 15 अक्टूबर 2026 👁️ 1 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति पिछड़े वर्ग के अंतर्गत आरक्षण का स्वतः दावा नहीं कर सकते: सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने व्‍यवस्‍था दी है कि हिंदू धर्म से इस्लाम या अन्य गैर-हिंदू धर्मों में धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति पिछड़े वर्ग के अंतर्गत आरक्षण का स्वतः दावा नहीं कर सकते। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध तमिलनाडु सरकार की याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्‍यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि पूर्व के सामाजिक पिछड़ेपन को धर्मांतरण के बाद आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में धर्मांतरण स्वतः किसी अधिसूचित पिछड़े वर्ग समुदाय की सदस्यता प्रदान नहीं करता। न्यायालय ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अंतर्गत वैधानिक लाभ केवल किसी व्यक्ति की धर्मांतरण-पूर्व स्थिति के आधार पर नहीं दिए जा सकते। न्यायालय ने दोहराया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है।

यह फैसला मार्च 2024 के तमिलनाडु सरकार के एक आदेश से संबंधित याचिका के जवाब में आया है, जिसमें दूसरा धर्म अपना चुके लोगों को आरक्षण लाभ देने की मांग की गई थी। उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए, सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कहा कि निजी धार्मिक निकाय वैधानिक अधिकारों का निर्धारण नहीं कर सकते हैं और हिंदू धर्म में पुनः धर्मांतरण के लिए सक्षम अधिकारियों द्वारा स्वतंत्र, तथ्य आधारित विशिष्ट सत्यापन की आवश्यकता होगी।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।