भोपाल

धार्मिकता पर भारी पड़ती भव्यता की होड़: शहर के मुख्य चौराहों और रास्तों पर कब्ज़ा, कोलाहल नियमों की उड़ रही धज्जियां

लेखक: Muhammad Naseem अंतिम अपडेट: 14 अक्टूबर 2026 👁️ 14 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
धार्मिकता पर भारी पड़ती भव्यता की होड़: शहर के मुख्य चौराहों और रास्तों पर कब्ज़ा, कोलाहल नियमों की उड़ रही धज्जियां

भोपाल। इन दिनों शहर में नवरात्रि के पावन पर्व की धूम है। चारों ओर मां दुर्गा की भक्ति के गीत गूंज रहे हैं और श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं। लेकिन इस धार्मिक उल्लास के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है, जिसने आस्था के इस उत्सव को आम नागरिकों, बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों के लिए एक बड़ी परेशानी में बदल दिया है। शहर के मुख्य रास्तों, व्यस्त चौराहों और गलियों को बंद करके अंधाधुंध तरीके से पंडाल और झांकियां सजाई जा रही हैं। स्थिति यह है कि कई जगहों पर एक सड़क पर मात्र 5-10 फीट की दूरी पर दो अलग-अलग समितियां पंडाल लगाकर बैठी हैं, जिससे आम जनता का पैदल चलना भी दूभर हो गया है।

आस्था या समितियों की आपसी सियासत?

कोई भी धार्मिक आयोजन श्रद्धालुओं की सुविधा और उनकी मानसिक शांति के लिए होता है। लेकिन वर्तमान में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन आयोजनों का वास्तविक धार्मिक उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया है। इसकी जगह अब समितियों के बीच 'बढ़-चढ़कर' अपनी ताकत दिखाने की होड़ और स्थानीय राजनीति ने ले ली है। मनमर्जी से किसी भी व्यस्त मार्ग को अवरुद्ध कर पंडाल तान दिए गए हैं।

इस अव्यवस्था के कारण जो श्रद्धालु—विशेषकर महिलाएं, छोटे बच्चे और बुजुर्ग—माता के दर्शन करने, आरती में शामिल होने या झांकियां देखने निकल रहे हैं, वे भारी भीड़, संकरे रास्तों और ट्रैफिक जाम के कारण सही तरीके से शामिल ही नहीं हो पा रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि ऐसा लगता है मानो इन समितियों ने इन सार्वजनिक स्थानों को सिर्फ अपने व्यक्तिगत और राजनैतिक वर्चस्व के प्रदर्शन का साधन बना लिया है, जहां आम समुदाय की सहूलियत की कोई जगह नहीं बची है।

लाउडस्पीकर्स की जंग: कोलाहल अधिनियम कागजों तक सीमित

इस भव्यता की होड़ का सबसे खतरनाक पहलू है—असहनीय ध्वनि प्रदूषण। अगल-बगल लगी झांकियों के बीच मानो 'साउंड सिस्टम' की जंग छिड़ी हुई है। एक पंडाल का डीजे (DJ) दूसरे पंडाल की आवाज को दबाने के लिए पूरी क्षमता से बजाया जा रहा है।

इस कोलाहल के कारण आसपास रहने वाले हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप और माइग्रेन के मरीजों का जीना मुहाल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है। 'मध्य प्रदेश कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985' और 'ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' के सख्त कानूनी प्रावधानों के बावजूद, जमीनी स्तर पर डेसिबल (Decibel) सीमाओं का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।

सवालों के घेरे में स्थानीय प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस

इस पूरी अव्यवस्था के बीच जनता के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर इन्हें नियंत्रित कौन कर रहा है? स्थानीय प्रशासन, नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस विभाग किस आधार पर इन मुख्य चौराहों और व्यस्त रास्तों को पूरी तरह बंद करने की अनुमति दे रहे हैं?

हाल ही में उच्च न्यायालयों के भी ऐसे कई सख्त निर्देश आए हैं जिनमें स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी धार्मिक आयोजन के कारण यातायात बाधित नहीं होना चाहिए और ध्वनि प्रदूषण नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए। इसके बावजूद, प्रशासनिक अधिकारियों की यह अनदेखी या मूक सहमति जनता के लिए सिरदर्द बन चुकी है। यदि समय रहते इन अवैध और असुविधाजनक पंडालों तथा अनियंत्रित लाउडस्पीकरों पर नकेल नहीं कसी गई, तो आस्था के नाम पर होने वाली यह मनमर्जी आने वाले समय में कानून-व्यवस्था के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है।

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Muhammad Naseem

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिंतक हैं। जिनका समाज के विभिन्न हिस्सों और समस्याओं पर गहरा अध्ययन है।