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डीडवाना की नमक झील बनी विदेशी परिंदों का आशियाना, हजारों किलोमीटर दूर से आते हैं ‘पावणे’

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
डीडवाना की नमक झील बनी विदेशी परिंदों का आशियाना, हजारों किलोमीटर दूर से आते हैं ‘पावणे’

कई प्रजातियों से गुलजार राजस्थान के वेटलैंड्स, अनुकूल मौसम और भरपूर भोजन खींच लाते हैं विदेशी मेहमान, संरक्षण की चुनौतियों के बीच प्राकृतिक विरासत बचाने की जरूरत

डीडवाना-कुचामन, 10 अक्टूबर। डीडवाना-कुचामन की नमक झील और सिंघी सरोवर इन दिनों प्रवासी पक्षियों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। हजारों किलोमीटर का सफर तय कर विदेशी परिंदे राजस्थान के जलक्षेत्रों में पहुंचते हैं और यहां की झीलों को अपने कलरव से गुलजार कर देते हैं। अनुकूल मौसम, भोजन की उपलब्धता और सुरक्षित ठिकानों की तलाश में आने वाले इन पक्षियों में रंग-बिरंगे फ्लेमिंगो खास आकर्षण रहते हैं। सांभर झील सहित प्रदेश के अन्य वेटलैंड्स भी इन प्रवासी मेहमानों के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। स्थानीय स्तर पर इन परिंदों को ‘पावणे’ यानी मेहमानों के रूप में देखा जाता है।

सर्दियों की शुरुआत के साथ ही राजस्थान के वेटलैंड्स में प्रवासी पक्षियों की आवाजाही बढ़ने लगती है। साइबेरिया, रूस, मंगोलिया और मध्य एशिया के ठंडे क्षेत्रों से आने वाले ये पक्षी लंबी दूरी तय कर यहां पहुंचते हैं। फ्लेमिंगो के अलावा बार-हेडेड गूज, ग्रेलैग गूज, कॉमन क्रेन, पिंटेल, शॉवलर और पेलिकन जैसी कई प्रजातियां प्रदेश के अलग-अलग जलक्षेत्रों में दिखाई देती हैं।

इन पक्षियों की मौजूदगी राजस्थान की जैव विविधता और झीलों के पारिस्थितिक महत्व को दर्शाती है। हजारों किलोमीटर का सफर तय कर राजस्थान पहुंचने खास वजह यहां का अनुकूल मौसम, भोजन की उपलब्धता और ठहरने के लिए उपयुक्त नमभूमि है। सर्दियों में साइबेरिया और दूसरे ठंडे क्षेत्रों में तापमान गिरने तथा कई जलस्रोतों के जम जाने से पक्षी अपेक्षाकृत गर्म इलाकों की ओर रुख करते हैं।

सेंट्रल एशियन फ्लाईवे से जुड़े प्रवासी मार्गों पर राजस्थान के वेटलैंड्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डीडवाना की नमक झील जैसे जलक्षेत्रों में फ्लेमिंगो को नील-हरित शैवाल, छोटे जलीय जीव और अन्य सूक्ष्म खाद्य पदार्थ मिलते हैं, जो उनके लिए भोजन का प्रमुख स्रोत बनते हैं। अनुकूल परिस्थितियां इन पक्षियों को यहां ठहरने में मदद करती हैं और मौसम बदलने पर ये अपने मूल क्षेत्रों की ओर लौट जाते हैं।

राजस्थान के वेटलैंड्स में पक्षियों की मौजूदगी से जुड़े वर्ष 2026 के वाटरबर्ड गणना संबंधी उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 117 वेटलैंड्स पर पक्षियों की 112 प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें लेसर फ्लेमिंगो की संख्या करीब 1.46 लाख और ग्रेटर फ्लेमिंगो की संख्या 37 हजार से अधिक बताई गई है। ये आंकड़े प्रदेश के जलक्षेत्रों में पक्षियों की विविधता और उनके संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हैं। हालांकि, इन आंकड़ों का सटीक संदर्भ समझने के लिए संबंधित आधिकारिक रिपोर्ट और गणना की पद्धति की पुष्टि जरूरी है।

प्राणी शास्त्र के सहायक आचार्य वीरेंद्र कुमार के अनुसार, प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी और उनकी आवाजाही को समझने में प्राकृतिक आवास, भोजन की उपलब्धता तथा जलक्षेत्रों की परिस्थितियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वहीं, वनस्पति शास्त्र की सहायक आचार्य ममता के विचारों के माध्यम से झीलों की वनस्पति और प्राकृतिक खाद्य शृंखला के महत्व को भी समझा जा सकता है। वेटलैंड्स में मौजूद वनस्पति और सूक्ष्म जलीय जीव अनेक पक्षियों के लिए भोजन और अनुकूल आवास उपलब्ध कराने में योगदान देते हैं।

प्रवासी पक्षियों का आगमन जहां राजस्थान की प्राकृतिक संपदा को उजागर करता है, वहीं उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी याद दिलाता है। जलस्तर में कमी, प्रदूषण, अतिक्रमण, नमक खनन का दबाव, अवैध शिकार और पक्षियों में फैलने वाली बीमारियां इनके प्राकृतिक आवास के लिए चुनौती बन सकती हैं। ऐसे में डीडवाना की नमक झील, सिंघी सरोवर, सांभर झील और प्रदेश के दूसरे वेटलैंड्स का संरक्षण जरूरी है।

जलाशयों की नियमित निगरानी, प्रदूषण पर नियंत्रण, अवैध शिकार की रोकथाम और पक्षियों के सुरक्षित आवास सुनिश्चित करने जैसे कदम इनके संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, जिम्मेदार इको टूरिज्म को बढ़ावा देने से इन प्राकृतिक स्थलों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।

हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर डीडवाना की झीलों पर उतरने वाले ये परिंदे प्रकृति की खूबसूरती और उसकी साझी विरासत का संदेश देते हैं। इनका आगमन केवल एक मनमोहक नजारा नहीं, बल्कि स्वस्थ पर्यावरण और जैव विविधता के महत्व को समझने का अवसर भी है। विश्व प्रवासी पक्षी दिवस हमें याद दिलाता है कि इन विदेशी मेहमानों का कलरव यूं ही गूंजता रहे, इसके लिए उनकी झीलों और प्राकृतिक आवासों को बचाना जरूरी है।

बाइट-01 : वीरेंद्र कुमार, सहायक आचार्य, प्राणी शास्त्र

बाइट-02 : ममता, सहायक आचार्य, वनस्पति शास्त्र

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।