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दिशा’ मिशन से सुरक्षित रहेंगे भारत के सैटेलाइट

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 29 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
दिशा’ मिशन से सुरक्षित रहेंगे भारत के सैटेलाइट

भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई उपलब्धियों की ओर बढ़ रहा है। उदयपुर में आयोजित राष्ट्रीय भौतिकी बैठक में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) के डीन प्रो. डी. पल्लम राजू ने ‘दिशा’ मिशन की जानकारी दी। इस जुड़वां उपग्रह मिशन के जरिए पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन किया जाएगा। मिशन के तहत विकसित किए जा रहे उपकरणों से सौर एवं भू-चुंबकीय तूफानों के प्रभावों को समझने और उनकी समय रहते जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी। इससे अंतरिक्ष में मौजूद भारतीय उपग्रहों को संभावित नुकसान से बचाने की दिशा में सहायता मिल सकती है। बैठक में देशभर के भौतिक वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं ने भी भाग लिया।

जयपुर, 29 अक्टूबर। भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में ‘दिशा’ मिशन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस मिशन के जरिए पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन किया जाएगा, जिससे सौर और भू-चुंबकीय तूफानों के प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी। उदयपुर में आयोजित राष्ट्रीय भौतिकी बैठक के दौरान अंतरिक्ष विभाग की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के डीन प्रो.

डी. पल्लम राजू ने मिशन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। उदयपुर की सौर वेधशाला की ओर से आयोजित राष्ट्रीय भौतिकी बैठक में देशभर के वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता शामिल हुए। बैठक के दौरान अंतरिक्ष मौसम, सौर गतिविधियों और आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला यानी पीआरएल के डीन प्रो.

डी. पल्लम राजू ने बताया कि ‘दिशा’ मिशन एक जुड़वां उपग्रह मिशन है। इसके माध्यम से पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाएगा। मिशन के तहत तीन उपकरण विकसित किए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य सौर और भू-चुंबकीय तूफानों से संबंधित परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझना है।

दरअसल, सूर्य में होने वाली तीव्र गतिविधियों का असर पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण पर पड़ सकता है। इन गतिविधियों से उपग्रहों के संचालन और अंतरिक्ष आधारित तकनीकी प्रणालियों पर प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। ऐसे में अंतरिक्ष मौसम की निगरानी और संभावित खतरों की समय रहते जानकारी प्राप्त करना महत्वपूर्ण है।

‘दिशा’ मिशन से मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़े इन प्रभावों को समझने और उपग्रहों की सुरक्षा से जुड़ी तैयारियों में मदद कर सकते हैं। प्रो. पल्लम राजू ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इसरो की योजना के अनुसार, वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।

वहीं, पीआरएल के निदेशक प्रो. अनिल भारद्वाज ने बताया कि राष्ट्रीय भौतिकी बैठक में देशभर के प्रमुख भौतिक वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन में विशेषज्ञ व्याख्यानों के साथ वैज्ञानिकों के बीच संवाद और शोध को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। उदयपुर सौर वेधशाला के पूर्व वैज्ञानिक अशोक अम्बास्था ने बताया कि वर्ष 1975 में स्थापित यह वेधशाला आज सूर्य के अध्ययन और अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है।

यहां सौर गतिविधियों और उनसे जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं को समझने के लिए अनुसंधान किया जाता है।

बाइट — 1: अशोक अम्बास्था, पूर्व वैज्ञानिक, सौर वेधशाला

बाइट — 2: प्रो. डी. पल्लम राजू, डीन, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), अंतरिक्ष विभाग

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।