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Doomscrolling: क्या है डूमस्क्रॉलिंग की जानलेवा लत? सोशल मीडिया पर बुरी खबरें पढ़ने से कैसे बढ़ रही है एंग्जायटी और डिप्रेशन, साइकोलॉजिस्ट से जानें बचाव के तरीके

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 4 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
Doomscrolling: क्या है डूमस्क्रॉलिंग की जानलेवा लत? सोशल मीडिया पर बुरी खबरें पढ़ने से कैसे बढ़ रही है एंग्जायटी और डिप्रेशन, साइकोलॉजिस्ट से जानें बचाव के तरीके

सुबह आंख खुलते ही तकिए के नीचे से फोन निकालना, रात को सोने से पहले बिस्तर पर घंटों अंगूठे से स्क्रीन को नीचे खिसकाते रहना और लगातार युद्ध, दुर्घटनाएं, अपराध, आर्थिक मंदी या महामारियों की खौफनाक खबरें पढ़ते चले जाना—अगर यह आपकी भी दैनिक दिनचर्या बन चुका है, तो आप अकेले नहीं हैं।

आधुनिक डिजिटल युग में करोड़ों लोग अनजाने में एक गंभीर मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह में फंस चुके हैं, जिसे मेडिकल और साइकोलॉजिकल भाषा में 'डूमस्क्रॉलिंग' (Doomscrolling) या 'डूमसर्फिंग' कहा जाता है। 'डूम' (तबाही या दुर्भाग्य) और 'स्क्रॉलिंग' (स्क्रीन को ऊपर-नीचे सरकाना) से मिलकर बना यह शब्द उस अनियंत्रित आदत को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति यह जानते हुए भी कि खबरें उसे परेशान, भयभीत और दुखी कर रही हैं, लगातार नकारात्मक और निराशाजनक सूचनाओं को कंज्यूम करता चला जाता है।

दिमाग में कैसे काम करता है यह चक्र? समझिए न्यूरोसाइंस मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इंसान का दिमाग विकासवादी नजरिए से (Evolutionary Biology) हमेशा खतरों को पहले भांपने के लिए तैयार रहता है, जिसे 'नेगेटिविटी बायस' (Negativity Bias) कहा जाता है।

आदिम काल में जीवित रहने के लिए संभावित खतरों (जंगली जानवर, प्राकृतिक आपदा) से सतर्क रहना जरूरी था। आज जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया (एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक या न्यूज एग्रीगेटर ऐप्स) पर कोई बुरी या सनसनीखेज खबर देखता है, तो दिमाग का सतर्कता केंद्र—'एमीग्डाला' (Amygdala) सक्रिय हो जाता है।

यह मस्तिष्क को संकेत भेजता है कि खतरा आसपास है और अधिक जानकारी जुटाना सुरक्षा के लिए जरूरी है। इसी खोज में जब यूजर एक के बाद एक दर्दनाक वीडियो या पोस्ट देखता है, तो सोशल मीडिया के एआई एल्गोरिदम उसे उसी तरह का और अधिक सनसनीखेज कंटेंट परोसने लगते हैं।

इस प्रक्रिया में दिमाग में तनाव बढ़ाने वाले हॉर्मोन कोर्टिसोल (Cortisol) और एड्रेनालाईन का भारी स्राव होने लगता है, जो धीरे-धीरे नर्वस सिस्टम को 'फाइट या फ्लाइट' (Fight-or-Flight) मोड में लॉक कर देता है।

एंग्जायटी, अनिद्रा और डिप्रेशन: शरीर पर डूमस्क्रॉलिंग का असर मनोरोग विशेषज्ञों और न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार, लगातार कई हफ्तों या महीनों तक डूमस्क्रॉलिंग करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं: सामान्यीकृत चिंता विकार (Generalized Anxiety): व्यक्ति हर समय किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त रहने लगता है।

छोटी-छोटी बातों पर दिल की धड़कन तेज होना, घबराहट और पैनिक अटैक (Panic Attacks) का खतरा बढ़ जाता है। क्रोनिक अनिद्रा (Insomnia): रात में स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) नींद के हॉर्मोन 'मेलाटोनिन' को दबा देती है।

इसके साथ जब दिमाग में भयावह खबरों के विचार घूमते रहते हैं, तो गहरी नींद (REM Sleep) नहीं आ पाती और व्यक्ति सुबह थका हुआ उठता है।

निराशा और संवेदनहीनता (Compassion Fatigue): लगातार त्रासदी देखने से व्यक्ति या तो अत्यधिक संवेदनशील होकर डिप्रेशन में चला जाता है, या फिर उसकी संवेदनाएं इतनी कुंद हो जाती हैं कि उसे वास्तविक जीवन के दुखों से भी कोई फर्क पड़ना बंद हो जाता है।

फिजिकल सिम्पटम्स: गर्दन और कंधों में अकड़न (Text Neck), सिरदर्द, आंखों में सूखापन, और पाचन तंत्र की गड़बड़ी (IBS - इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) का सीधा संबंध इसी लंबे समय तक बने रहने वाले तनाव से है। क्या आप डूमस्क्रॉलिंग के आदी हैं?

पहचानिए ये लक्षण यदि आपके व्यवहार में निम्नलिखित लक्षण दिखने लगे हैं, तो यह समझ लेना चाहिए कि स्क्रीन का यह नशा आपकी मानसिक शांति छीन रहा है: किसी नकारात्मक घटना (जैसे युद्ध, विमान हादसा या अपराध) के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद भी उसी विषय पर लगातार नए कमेंट्स और थ्रेड्स पढ़ना।

फोन हाथ से छूटते ही बेचैनी या 'फोमो' (FOMO - Fear of Missing Out) महसूस होना। सोशल मीडिया बंद करने के बाद मन में भारीपन, उदासी या दुनिया के खत्म होने जैसा भय महसूस होना। काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में लगातार कठिनाई होना और बार-बार फोन चेक करने का मन करना। डूमस्क्रॉलिंग की लत कैसे तोड़ें?

एक्सपर्ट्स के 6 असरदार टिप्स साइकोलॉजिस्ट्स और डिजिटल वेलबीइंग एक्सपर्ट्स इस लत से बाहर निकलने के लिए कुछ व्यावहारिक और सरल रणनीतियों को अपनाने की सलाह देते हैं: 'नो-स्क्रीन' बेडरूम नियम: सोने से कम से कम 60 मिनट पहले और सुबह उठने के पहले 45 मिनट तक फोन को खुद से दूर रखें।

बेडरूम में फोन चार्ज करने के बजाय अलार्म के लिए पारंपरिक घड़ी का इस्तेमाल करें। ऐप टाइमर और स्क्रीन लिमिट: अपने स्मार्टफोन में मौजूद 'डिजिटल वेलबीइंग' (Android) या 'स्क्रीन टाइम' (iOS) फीचर का उपयोग करके सोशल मीडिया और न्यूज ऐप्स पर रोजाना का अधिकतम 30 मिनट का सख्त टाइमर सेट करें।

ग्रेस्केल मोड (Grayscale) ऑन करें: अपने फोन की स्क्रीन को रंगीन के बजाय 'ब्लैक एंड व्हाइट' (Grayscale) मोड में डाल दें। रंग गायब होते ही स्क्रीन से दिमाग को मिलने वाला डोपामाइन स्टिम्युलेशन कम हो जाता है और फोन इस्तेमाल करने का आकर्षण अपने आप घट जाता है।

नोटिफिकेशन्स बंद करें: ब्रेकिंग न्यूज और सोशल मीडिया के सभी नॉन-एसेंशियल पुश नोटिफिकेशन्स को म्यूट कर दें। दिन में केवल एक या दो निश्चित समय तय करें जब आप खुद जाकर दिनभर की महत्वपूर्ण खबरें पढ़ें।

सचेत ठहराव (Mindful Pause): जब भी आपको लगे कि आप 10 मिनट से लगातार स्क्रॉल कर रहे हैं, तो रुकें और खुद से पूछें—"क्या यह जानकारी इस वक्त मेरे किसी काम की है? क्या इसे पढ़कर मुझे अच्छा लग रहा है?" यह छोटा सा सवाल दिमाग को ऑटो-पायलट मोड से बाहर खींच लाता है।

वास्तविक दुनिया से जुड़ाव: शाम का समय प्रकृति के बीच वॉक करने, परिवार से बात करने, किताबें पढ़ने या किसी हॉबी में बिताएं ताकि दिमाग को वर्चुअल दुनिया के संकटों से मुक्ति मिल सके।

यदि तमाम कोशिशों के बावजूद एंग्जायटी, पैनिक या नींद न आने की समस्या नियंत्रित नहीं हो रही है, तो बिना किसी संकोच के किसी योग्य क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर से संपर्क करें और कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) की मदद लें।

📡 स्रोत: NewsData.io

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