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'दुनिया का बड़ा हिस्सा सैन्य शासन का समर्थन कर रहा था, तब भी रूस ने हमारा साथ दिया', म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में बोले जयशंकर

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 5 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
'दुनिया का बड़ा हिस्सा सैन्य शासन का समर्थन कर रहा था, तब भी रूस ने हमारा साथ दिया', म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में बोले जयशंकर

विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने रविवार को रूस के साथ भारत के पुराने रिश्तों का जिक्र किया.

उन्होंने कहा कि जब दिल्ली की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा होता था और दुनिया का बड़ा हिस्सा सैन्य शासन का समर्थन कर रहा था, तब रूस हमारे संग खड़ा था.

म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के बीच 1950 के दशक से ही मजबूत संबंध रहे हैं. उन रिश्तों की विरासत आज भी हमारे संबंधों को रूप दे रही है.

भारत और रूस के रिश्ते ऐतिहासिक: जयशंकर जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से काफी बेहतर रहे हैं. खासकर 1950 के दशक से ही. उस को इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता है.

उन्होंने कहा कि रूस जो पहले सोवियत संघ था, कई मौकों पर हमारे संग खड़ा रहा. उस समय हमारी सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता को खतरा था.

उन्होंने कहा कि ऐसे वक्त में जब दुनिया का एक बड़ा भाग हमारे पड़ोसी देश में सैन्य शासन (पाकिस्तान) का समर्थन करता रहा, रूस एक ऐसा देश था, जिसके हमारे संग रिश्ते बेहतर थे. उस विरासत ने कई तरह से हमारे रिश्तों को आकार दिया.

ग्लोबल ऑर्डर पर जयशंकर का जवाब विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने भारत में आने वाले पांच से दस वर्षों में ग्लोबल पावर की रैंकिंग में तेजी से ऊपर उठने की क्षमता है.

उन्होंने इसके लिए आने वाले दशकों में तेजी से विकास, मददगार डेमोग्राफिक प्रोफाइल और नए आर्थिक मौकों को उभरने का जिक्र किया.

रविवार को दिल्ली में म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में जयशंकर से यह पूछा गया कि अगले पांच से दस सालों में ग्लोबल ऑर्डर में भारत के हालात क्या होने वाले हैं.

उन्होंने कहा कि जिन देशों को अभी मिडिल पावर की तरह देखा जाता है, जरूरी नहीं कि वे सभी एक ही रास्ते पर हों. कुछ शक्तियां कम और कुछ ज्यादा हैं.

भारत के बारे में बात करते हुए जयशंकर बोले कि देश के सामने तेज विकास के कई दशक हैं.

उन्होंने तर्क दिया कि इसकी डोमोग्राफिक प्रोफाइल उस विकास को बनाए रखने में सहायक होगी.

ग्लोबल इकनॉमी में संभावनाएं- जयशंकर जयशंकर ने तर्क दिया कि भारत को शायद पहले की अर्थव्यवस्थाओं की ओर से अपनाए गए पारंपरिक औद्योगीकरण के रास्ते पर चलने की आवश्यकता न हो, तेजी से बदलती ग्लोबल इकनॉमी में नई संभावनाएं हैं.

उन्होंने कहा कि वे तो यही कहेंगे कि विश्व अब कहीं अधिक क्रिएटिव हो चुका है. कई संभावनाएं हैं, ऐसे में हमें जरूरी नहीं कि औद्योगीकरण के पुराने पथ पर चलने की.

📡 स्रोत: NewsData.io

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