Explained: अंदरूनी बैठकों के नियम से लेकर SIR की अंतिम समय-सीमा तक, 23 सितंबर के बाद ECI में हुए 7 बदलाव
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भारतीय चुनाव आयोग ने 23 सितंबर के बाद से अपनी कार्यप्रणाली, प्रशासनिक निर्णयों और मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रियाओं में कई महत्वपूर्ण और दूरगामी बदलावों की घोषणा की है.
यह कदम द इंडियन एक्सप्रेस की एक बहुचर्चित रिपोर्ट के सामने आने के बाद उठाया गया है.
उस रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया था कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों की अवधि के दौरान कम से कम 14 अवसरों पर आयोग के विभिन्न निर्णयों पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी.
उनके अनुसार, ये निर्णय उनकी अग्रिम जानकारी या औपचारिक मंजूरी के बिना ही लागू कर दिए गए थे.
ये आपत्तियां मुख्य रूप से मतदाता सूची डेटाबेस के प्रबंधन में किए गए तकनीकी बदलावों और मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और उन्हें पुनः बहाल करने की प्रशासनिक प्रक्रिया से संबंधित थीं.
इस विवाद के बाद देश के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में भारी प्रतिक्रिया देखने को मिली.
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची की 'विशेष गहन समीक्षा' (SIR) की पूरी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों के हजारों लोग सड़कों पर उतर आए.
प्रदर्शनों की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने दिल्ली में मेट्रो सेवाएं आंशिक रूप से बंद कीं, इंटरनेट सेवाओं पर अस्थाई रोक लगाई, धारा 144 (निषेधाज्ञा) लागू की और भारी संख्या में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की, जिससे राजधानी एक तरह से अभेद्य किले में तब्दील हो गई.
इन तमाम विवादों और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि विचारों में भिन्नता या मतभेद उसकी सामान्य, लोकतांत्रिक और संस्थागत निर्णय लेने की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा हैं.
आयोग ने जोर देकर कहा कि उसके सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से ही लिए गए थे.
इसके साथ ही, प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और जन-आक्रोश को शांत करने के उद्देश्य से आयोग ने प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक स्तर पर 7 बड़े बदलाव
📡 स्रोत: ABP Live