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Explainer: ट्रंप और किम की फिर होगी मुलाकात? समझिए क्यों पिघल रही अमेरिका-नॉर्थ कोरिया की 'बर्फ'

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 19 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
Explainer: ट्रंप और किम की फिर होगी मुलाकात? समझिए क्यों पिघल रही अमेरिका-नॉर्थ कोरिया की 'बर्फ'

Donald Trump Kim Jong: अंतरराष्ट्रीय राजनीति के रंगमंच पर अमेरिका और उत्तर कोरिया के रिश्ते हमेशा से ही अप्रत्याशित और नाटकीय रहे हैं. एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जोंग उन के बीच संभावित मुलाकात को लेकर कूटनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है.

एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) सम्मेलन के आसपास इस शिखर वार्ता के कयास लगाए जा रहे हैं. ट्रंप अपनी व्यक्तिगत कूटनीति और खुद को एक कुशल समझौतेबाज के रूप में स्थापित करने के लिए प्योंगयांग के साथ संवाद की मेज पर लौटने की तैयारी कर रहे हैं.

हालांकि, इस बार की परिस्थितियां पिछली वार्ताओं की तुलना में पूरी तरह भिन्न हैं, और प्योंगयांग का रुख पहले से कहीं अधिक आक्रामक और स्वतंत्र दिखाई दे रहा है. कोरियाई प्रायद्वीप में सुरक्षा संकट इस कूटनीतिक पहल के बीच कोरियाई प्रायद्वीप में सुरक्षा समीकरणों में भारी फेरबदल देखा जा रहा है.

अमेरिकी नेतृत्व द्वारा दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले पारंपरिक संयुक्त सैन्य अभ्यासों को सीमित करने और उनके भारी वित्तीय खर्चों पर सवाल उठाने से वाशिंगटन के अपने पुराने सहयोगी के साथ रिश्तों में असहजता पैदा हुई है.

इस तरह के कदमों से सियोल में यह संदेश गया है कि अमेरिका अपनी तात्कालिक राजनीतिक प्राथमिकताओं के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा साझेदारियों की अनदेखी कर रहा है. उत्तर कोरिया के खिलाफ दशकों से तैयार साझा प्रतिरोध तंत्र में इस प्रकार का लचीलापन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को गहराई से प्रभावित कर रहा है.

ये भी पढ़ें: वैश्विक तनाव और ऊंचे बॉन्ड यील्ड के दबाव में टूटा सोने-चांदी का भाव, सिल्वर करीब 2 प्रतिशत फिसला 2018 में हुई थी पहली बैठक वर्तमान वार्ता के प्रयासों को समझने के लिए पूर्व के घटनाक्रमों पर नजर डालना जरूरी है.

वर्ष 2018 में सिंगापुर में हुई पहली ऐतिहासिक बैठक ने उम्मीद जगाई थी कि दोनों देश परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में कोई ठोस रास्ता निकाल सकते हैं.

इसके बाद वर्ष 2019 में वियतनाम के हनोई में आयोजित दूसरा शिखर सम्मेलन पूरी तरह बेनतीजा रहा, क्योंकि आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और परमाणु कार्यक्रमों को रोकने के मुद्दे पर दोनों पक्ष किसी सहमति पर नहीं पहुंच सके.

उसी वर्ष दोनों नेताओं की कोरियाई सीमा पर डिमिलिटराइज्ड जोन में हुई प्रतीकात्मक मुलाकात सुर्खियों में जरूर रही, लेकिन ठोस नीतिगत स्तर पर कोई स्थायी बदलाव लाने में विफल रही.

इन ऐतिहासिक अनुभवों ने प्योंगयांग को अमेरिकी प्रस्तावों को लेकर अत्यधिक सतर्क बना दिया है. 2019 के बाद किम ने हथियार बनाने में दिया ध्यान वर्ष 2019 के बाद से उत्तर कोरिया की रक्षा नीति में आमूलचूल बदलाव आया है.

उस दौर में जहां किम जोंग उन आर्थिक पाबंदियों से राहत पाने के लिए कूटनीतिक समझौते की तलाश में थे, वहीं बीते वर्षों में उन्होंने अपना पूरा ध्यान सैन्य आत्मनिर्भरता और संहारक हथियारों के विकास पर केंद्रित किया.

वर्तमान में उत्तर कोरिया ने ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों और परमाणु वॉरहेड्स की श्रृंखला विकसित कर ली है, जो सीधे अमेरिकी मुख्य भूमि तक मार करने की क्षमता रखती हैं.

इस ठोस परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण के बाद अब उत्तर कोरियाई नेतृत्व को किसी भी रक्षात्मक समझौते के लिए अमेरिका के सामने झुकने या रियायतें मांगने की कोई रणनीतिक आवश्यकता महसूस नहीं होती.

ये भी पढ़ें: 'ऑपरेशन सिंदूर' पर बनी डॉक्यूमेंट्री ने उड़ाई पाकिस्तान की नींद, PAK सेना ने रात 2 बजे की ये बात वैश्विक भू-राजनीति में आए बदलावों, विशेषकर रूस और यूक्रेन के टकराव ने उत्तर कोरिया को एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया.

प्योंगयांग ने मॉस्को को व्यापक स्तर पर गोला-बारूद, पारंपरिक हथियार और सैन्य सहायता उपलब्ध कराकर एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी स्थापित की. इस सहयोग से उत्तर कोरियाई सेना को आधुनिक युद्धक्षेत्र में सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल का व्यावहारिक अनुभव मिला, जिसकी कमी वह लंबे समय से महसूस कर रही थी.

इसके बदले में रूस से उन्नत उपग्रह प्रणालियां, अंतरिक्ष तकनीक और मिसाइल इंजीनियरिंग हासिल कर उत्तर कोरिया ने अपनी तकनीकी क्षमताओं को कई गुना बढ़ा लिया है. इस नए ध्रुवीकरण ने किम जोंग उन के आत्मविश्वास को वैश्विक स्तर पर मजबूती दी है.

एक समय ऐसा था जब उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षणों के चलते बीजिंग और प्योंगयांग के बीच कूटनीतिक दूरियां बढ़ गई थीं. परंतु वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है, चीन ने उत्तर कोरिया के साथ अपने संबंधों को फिर से प्रगाढ़ कर लिया है.

इसके साथ ही, सख्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया ने वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों, रणनीतिक साझेदारियों और डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के रास्ते खोज लिए हैं.

आर्थिक रूप से बाहरी दबाव को झेलने की इस क्षमता ने प्योंगयांग को अमेरिकी आर्थिक रियायतों के प्रलोभन से पूरी तरह मुक्त कर दिया है. दिखावे की कूटनीति के प्रति प्योंगयांग की सतर्कता उत्तर कोरिया का नेतृत्व भली-भांति समझता है कि वाशिंगटन की कूटनीतिक घोषणाओं और उसकी वास्तविक प्रशासनिक नीतियों में अक्सर बड़ा अंतर होता है.

सार्वजनिक मंचों पर सैन्य अभ्यास सीमित करने जैसे बयानों के बावजूद जमीनी स्तर पर अमेरिकी विदेश और रक्षा नीतियां अपने निर्धारित एजेंडे पर ही चलती हैं.

पिछले समझौतों से एकतरफा हटने और बयानों के बार-बार बदलने के अनुभवों ने किम जोंग उन को यह सिखाया है कि केवल हेडलाइंस बटोरने वाली वार्ताओं से कोई वास्तविक सुरक्षा गारंटी नहीं मिलती. इसलिए उत्तर कोरिया किसी भी ऐसी बातचीत में शामिल होने से बच रहा है, जिसमें केवल दिखावटी कूटनीति हो और ठोस रणनीतिक लाभ न हों.

ये भी पढ़ें: अगर बाल रूखे और बेजान हैं, तो लगाएं मेथी के दाने से बना हेयर मास्क, हफ्ते भर में दिखेगा फर्क समकालीन विश्व व्यवस्था में उत्तर कोरिया की रणनीति अन्य देशों के लिए एक गंभीर रणनीतिक अध्ययन का विषय बन गई है.

वर्ष 2003 में परमाणु अप्रसार संधि से अलग होने के बाद प्योंगयांग ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और प्रतिबंधों को झेलते हुए अपनी संप्रभुता की ढाल के रूप में परमाणु हथियारों को प्राथमिकता दी.

इसके विपरीत, जिन देशों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर निर्भर रहकर अपने रक्षा कार्यक्रमों को सीमित किया, उन्हें गंभीर सैन्य और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा. इस तुलनात्मक यथार्थ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल वास्तविक सैन्य शक्ति ही संप्रभुता की अंतिम गारंटी होती है.

किम के पास अधुनिक परमाणु हथियार वर्तमान समय में किम जोंग उन किसी कमजोर या समझौते के लिए बेताब नेता की स्थिति में नहीं हैं. एक ओर जहां उनके पास अमेरिका तक मार करने वाले आधुनिक परमाणु हथियार हैं, वहीं दूसरी ओर रूस और चीन जैसी महाशक्तियों का कूटनीतिक और तकनीकी समर्थन भी उनके साथ है.

डोनाल्ड ट्रंप यदि अपनी पुरानी शैली में बातचीत की मेज पर लौटने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें यह समझना होगा कि प्योंगयांग अब बिना किसी ठोस, बराबरी के और अपरिवर्तनीय रणनीतिक समझौते के किसी भी दिखावटी वार्ता का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है. शक्ति के इस नए संतुलन ने कोरियाई प्रायद्वीप के भविष्य को और अधिक जटिल बना दिया है.

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📡 स्रोत: NewsData.io

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