फ्रेंड को 1 लाख तब भी फ्री, दुकानदार को 2500 पर भी चार्ज, ये कैसा कुतर्क है? अशनीर ग्रोवर
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UPI ट्रांजैक्शन को लेकर लगातार विवाद चल रहा है.
सोमवार को जब से वित्त मंत्रालय ने नया फैसला किया है, तभी से इस विवाद ने तूल पकड़ लिया है.
सरकार के इस फैसले के तहत अब यूपीआई के जरिए 2000 रुपये से ज्यादा की पेमेंट करने पर चार्जेस लगेंगे.
सरकार के इस फैसले के बाद तमाम व्यापारियों और जनता समेत अलग- अलग लोगों की प्रतिक्रिया सामने आ रही है.
वहीं हाल ही में BharatPe के फॉर्मर फाउंडर अशनीर ग्रोवर ने भी इसे लेकर बात की है.
अशनीर के सरकार के इस फैसला का जरा भी समर्थन नहीं किया, बल्कि उन्होंने इस फैसले पर आपत्ति जताई है.
इतना ही नहीं बल्कि अशनीर ने सरकार के इस फैसले को पूरी तरह से बेवकूफी भरा बता दिया है.
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क्या बोले अशनीर ग्रोवर?
दरअसल हाल ही में अशनीर ग्रोवर टाइम्स नाओ नवभारत की एक डिबेट में शामिल होने पहुंचे. इस दौरान उन्होंने सरकार के इस फैसले को लेकर बात की.
अशनीर से जब पूछा गया कि सरकार की 2 हजार रुपये से ऊपर के UPI ट्रांजैक्शन योजना के बारे में वो सोचते हैं, तब उन्होंने इसका जवाब देते हुए सरकार के फैसले की कड़ी निदा की.
उन्होंने इस फैसले को गलत बताते हुए इसका उदाहरण भी दिया. उन्होंने कहा,
'मुझे तो ये सब देखकर बहुत मजा आता है.
क्योंकि जब मैं सोचता हूं कि सरकार की बेवकूफियां कम हो गई हैं, तभी बढ़ जाती हैं.
मैं साफ देता हूं, मान लीजिए मान लीजिए मैंने एक हजार रुपये अपने दोस्त को यूपीआई से भेजे.
मैंने 1 लाख अपने दोस्त को भेजे या 3 हजार किसी क्यूआर कोड पर स्कैन करके दिए, तीनों मामलों में कॉस्ट ऑफ रनिंग द सिस्टम एक ही है.
फिर आप बताइयये कि दोस्त को एक लाख भेजने पर किसी को कोई पैसे नहीं लगेंगे, लेकिन एक छोटे दुकानदार को 500 रुपये की पेमेंट करने पर पैसे लगाने हैं. इसका क्या लॉजिक है?'
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📡 स्रोत: ABP Live Vyapar
💡 पृष्ठभूमि (Background)
फरवरी 2024 में वित्त मंत्रालय ने यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 2000 रुपये से अधिक की राशि पर चार्ज लगाने का निर्णय लिया। इस कदम से व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच विवाद तेज हो गया। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपीआई भारत का प्रमुख डिजिटल भुगतान माध्यम है और इसके नियमों में बदलाव से लाखों लेनदेन पर असर पड़ेगा। यदि बड़े लेनदेन पर शुल्क लगे, तो छोटे-छोटे व्यापारियों को लागत बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को भी अधिक भुगतान करना पड़ेगा, जिससे रोज़मर्रा के ख़रीदारी और व्यापारिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।