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गाडरवारा के मुकेश बसेड़िया 15 वर्षों से बांट रहे दीपावली की खुशियां, दुर्गम पहाड़ी बस्तियों में आदिवासी परिवारों को बांटते हैं उपहार

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 7 नवंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
गाडरवारा के मुकेश बसेड़िया 15 वर्षों से बांट रहे दीपावली की खुशियां, दुर्गम पहाड़ी बस्तियों में आदिवासी परिवारों को बांटते हैं उपहार

"दीवाली यानी रोशनी का त्योहार, खुशियों की चमक और अपनों के साथ जश्न। लेकिन ज़रा सोचिए, उन चेहरों पर मुस्कान कैसी लगती होगी, जिन्होंने कभी जगमगाते शहर की रोशनी नहीं देखी? जो उन दुर्गम पहाड़ों और जंगलों में रहते हैं, जहाँ आज भी त्योहार और आम दिनों में कोई फर्क नहीं होता। लेकिन... नरसिंहपुर के गाडरवारा से एक ऐसी शख्सीयत ताल्लुक रखती है, जो पिछले 15 सालों से इन पहाड़ों के अंधेरे को अपनी नेकी की रोशनी से मिटा रही है!

समाजसेवी गाडरवारा के रहने वाले मुकेश बसेड़िया से। पिछले 15 सालों से दीवाली के ठीक दो-तीन दिन पहले, मुकेश जी का एक ही ठिकाना होता है—दुर्गम पहाड़ी रास्ते और जंगलों में बसी आदिवासियों की झोपड़ियां। न कोई सरकारी मदद, न किसी बड़े संगठन का फंड—यह सब कुछ वे पूरी तरह से अपने स्व-खर्च पर करते हैं!"मुकेश बसेड़िया का साफ मानना है— 'अपने परिवार के साथ तो हर कोई दीवाली मना लेता है, असली इंसानियत तो तब है जब कोई उस चेहरे पर मुस्कान ले आए, जिसके लिए हर दिन एक संघर्ष है।' दीवाली के इस पावन पर्व पर वे इन पहाड़ी इलाकों तक पहुंचते हैं और आदिवासियों को वस्त्र, खाने-पीने का सामान, दीये और सबसे खास बात—बच्चों के चेहरों पर चमक लाने के लिए नए कपड़े और पटाखे खुद लेकर पहुंचते हैं।",

बाइट _ मुकेश बसेड़िया समाजसेवी गाडरवारा नरसिंहपुर

साइन आउट _ यह कहानी सिर्फ मुकेश बसेड़िया की नहीं है—यह हम सबके लिए एक आईना है। यह हमें याद दिलाती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े पदों या करोड़ों रुपयों की नहीं, बल्कि सिर्फ एक साफ नीयत और बड़े दिल की जरूरत होती है।

दीवाली सिर्फ दीपों का त्योहार नहीं, यह दिलों को जोड़ने का जरिया है। आज गाडरवारा का यह बेटा पूरे देश को यह सिखा रहा है कि— ‘दूसरों के जीवन में खुशियां बांटना ही सबसे बड़ी ईश्वर पूजा है।’

💡 पृष्ठभूमि (Background)

गाडरवारा के मुकेश बसेड़िया 15 वर्षों से दुर्गम पहाड़ी बस्तियों में दीपावली के उपहार बाँट रहे हैं, जिससे दूरस्थ आदिवासी परिवारों को रोशनी और खुशी मिलती है। यह पहल दर्शाती है कि कैसे एक व्यक्ति की दयालुता से ग्रामीण समाज में सांस्कृतिक अंतराल पाटे जा सकते हैं। इस खबर का महत्व यह है कि यह दिखाता है कि सरल प्रयासों से भी सामाजिक समावेश और सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाई जा सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ परंपरा और आधुनिकता का मेल कम है। आम जनता के लिए यह प्रेरणादायक उदाहरण है, जो समाजसेवा के प्रति जा

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।