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गौर जाटव दलित, गैर यादव OBC…, यूपी चुनाव से पहले BJP ने चला 'तुरूप का इक्का'!

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 6 अक्टूबर 2026 👁️ 3 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
गौर जाटव दलित, गैर यादव OBC…, यूपी चुनाव से पहले BJP ने चला 'तुरूप का इक्का'!

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति पर काम कर रही है.

पहले संगठन की लिस्ट उसके बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल और अब राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन की सूची को देखें तो इसमें बीजेपी अपने पुराने टेस्टेड फॉर्मूले से गैर जाटव दलित और गैर यादव ओबीसी को साधने के फार्मूले पर काम कर रही है.

बीजेपी सूत्रों की मानें तो बीजेपी इस फार्मूले के जरिए 2024 लोकसभा में अपने छिटके हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश कर रही है.

बीजेपी संगठन के लिहाज से यूपी को 6 क्षेत्रों में बांटा गया है और राज्यसभा की इस लिस्ट को देखें तो इसमें चार क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व दिया गया है.

काशी क्षेत्र: विद्यासागर सोनकर और राधाकांत ओझा

अवध क्षेत्र: प्रियंका रावत

कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र: गोपी कृष्ण पांडेय और प्रकाश पाल

ब्रज क्षेत्र: रामप्रताप चौहान, धर्मपाल सिंह और श्रुति गंगवार

बीजेपी की क्या रणनीति?

सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की रणनीति में अलग-अलग क्षेत्रों के प्रभावशाली सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने के साथ-साथ संगठन के स्तर पर भी इन वर्गों के बीच सक्रियता बढ़ाना शामिल है.

बीजेपी के लिए यह रणनीति नई नहीं है. 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपनाई थी.

चुनाव में मिला फायदा

पार्टी को इसका चुनावी लाभ भी मिला था और दोनों चुनावों में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में बड़ी जीत दर्ज की थी.

अब आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी एक बार फिर इसी सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ती नजर आ रही है.

राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन और संगठन में विभिन्न सामाजिक समूहों को प्

📡 स्रोत: ABP Live

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💡 पृष्ठभूमि (Background)

यह खबर बताती है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले भाजपा ने गैर जाटव दलित और गैर यादव ओबीसी वर्गों को जीतने के लिए ‘तुरूप का इक्का’ जैसी रणनीति अपनाई है। यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि पार्टी सामाजिक समीकरण को फिर से गढ़ रही है, जिससे चुनावी गतिशीलता बदल सकती है। अगर भाजपा इस फार्मूले को सफलतापूर्वक लागू करती है, तो यह आम जनता में सामाजिक वर्गों के बीच राजनीतिक समर्थन को पुनर्वितरित कर सकता है, जिससे वोटिंग पैटर्न में बदलाव और नीतिगत प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है।

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