गुजरात की दिवाली: लोकपरंपराओं, आस्था और उत्सव का अनूठा संगम
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नवंबर 07, नई दिल्ली: दीयों की रोशनी, रंगोली के रंग, मिठाइयों की मिठास और आतिशबाजी का उत्साह, दीपावली का त्योहार देशभर में अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। गुजरात में भी दिवाली की रौनक के बीच कई अनूठी लोकपरंपराएं देखने को मिलती हैं। माहीसागर में बच्चे के जन्म की खुशी में मरेया प्रज्वलित करने की परंपरा हो, सिंधी समाज की हाटड़ी पूजा या फिर सौराष्ट्र का पारंपरिक इंगोरिया युद्ध, ये सभी गुजरात की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।
दिवाली नजदीक आते ही गुजरात के बाजारों में रौनक बढ़ गई है। बाजार रंग-बिरंगी रोशनी, सजावटी सामान, मिठाइयों और उपहारों से सज गए हैं। परिवारों के साथ खरीदारी करने पहुंचे लोग घरों की सजावट से लेकर पूजा-पाठ की तैयारियों में जुटे हैं। वहीं, स्थानीय कुम्हार और कारीगर मिट्टी के दीये तैयार कर रहे हैं। दीयों की बढ़ती मांग से उन्हें भी रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। पटाखों की दुकानों पर भी लोगों की आवाजाही बढ़ी है और बच्चों में त्योहार को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
गुजरात के माहीसागर जिले में दिवाली के दौरान मरेया प्रज्वलित करने की एक खास लोकपरंपरा निभाई जाती है। परिवार में बच्चे के जन्म की खुशी में मरेया जलाया जाता है। परिवार के सदस्य इसे लेकर मोहल्ले और गांव के घरों में जाते हैं और नवजात बच्चे की लंबी उम्र तथा सुखी जीवन के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। इस परंपरा को जीवंत रखने में प्रजापति समाज के कारीगरों की अहम भूमिका है। वे मिट्टी से आकर्षक डिजाइन वाले मरेया तैयार करते हैं। इससे स्थानीय कला और संस्कृति को बढ़ावा मिलने के साथ कारीगरों को रोजगार भी मिलता है।
इसी तरह गुजरात के सिंधी समाज में मिट्टी की हाटड़ी का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। धनतेरस और दिवाली के अवसर पर हाटड़ी को व्यापार और समृद्धि का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है। इस परंपरा के तहत परिवार के प्रत्येक पुरुष सदस्य के नाम से अलग-अलग हाटड़ी में दीप प्रज्वलित किया जाता है। यह परंपरा परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना से जुड़ी है।
दिवाली के दौरान दाहोद की आदिवासी लोकसंस्कृति भी उत्सव को खास बनाती है। यहां पारंपरिक ढोल की थाप और आदिवासी परिधानों के साथ ढोल मेले का आयोजन होता है। वहीं, जेसेवाड़ा का गोल गधेडा मेला भी अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। इस आयोजन में पेड़ की ऊंची टहनी पर गुड़ की पोटली बांधी जाती है। इसे हासिल करने के लिए प्रतिभागियों के बीच मुकाबला होता है। इन आयोजनों के जरिए आदिवासी समाज की परंपराओं, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है।
त्योहार के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन सतर्क है। अहमदाबाद के प्रमुख बाजारों में बढ़ती भीड़ को देखते हुए पुलिस निगरानी बढ़ाई गई है। वहीं, दिवाली पर घर लौटने वाले यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए रेलवे की ओर से भी विशेष इंतजाम किए गए हैं।
कुल मिलाकर, गुजरात की दिवाली सिर्फ रोशनी और खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लोकआस्था, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक उत्सवों की भी खास जगह है। मिट्टी के दीयों और मरेया की रोशनी से लेकर हाटड़ी पूजा और आदिवासी मेलों तक, गुजरात की दिवाली अपनी विविध परंपराओं के जरिए त्योहार की खुशियों को और खास बनाती है।
बाइट: कुम्हारबाइट: ग्राहकबाइट: जिग्नेश शुक्ला, विद्वान पंडितबाइट: अनीता प्रजापति, मरेया कारीगरबाइट: दीपक आहूजा , व्यापारी, अहमदाबादबाइट: जशवंतसिंह भाभोर, सांसद, दाहोद (ढोल मेला)बाइट: नगरसिंह कसनाभाई पलास, आयोजक (ढोल मेला)बाइट: लवीना सिन्हा, डीसीपी, साइबर क्राइम, अहमदाबादबाइट: लवीना सिन्हा, डीसीपी, साइबर क्राइम, अहमदाबाद
💡 पृष्ठभूमि (Background)
गुजरात में दिवाली का त्योहार स्थानीय परंपराओं के साथ एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जहाँ माहीसागर में मरेया प्रज्वलन, सिंधी समाज की हाटड़ी पूजा और सौराष्ट्र की इंगोरिया युद्ध जैसी प्रथाएँ प्रमुख हैं। यह विषय स्थानीय सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक एकता को उजागर करता है। खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाती है कि कैसे एक राष्ट्रीय त्योहार को क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के साथ मिलाकर मनाया जाता है, जिससे सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता बढ़ती है। आम जनता पर इसका असर सकारात्मक है, क्योंकि इससे पर्यटन म
🎙️ वॉयस ऑफ क्रांति का मत
दीवाली की रोशनी में हम सबको याद दिलाता है कि परंपरा और उत्सव के बीच भी शांति और समझदारी की आवश्यकता है। जब भी किसी विवाद की चिंगारी उठे, संवाद और कानूनी मार्ग अपनाकर समाधान खोजें, ताकि गुस्सा और हिंसा से बचा जा सके। समाज को एकजुट होकर सांस्कृतिक समृद्धि का जश्न मनाना चाहिए, जहाँ हर आवाज़ को सम्मान मिले और सभी के लिए सुरक्षित वातावरण बना रहे।