गुरु की शिष्य को सीख:ऐसे लोगों का साथ चुनें जो आपको बेहतर बनने के लिए प्रेरित करते हैं, सकारात्मक संगति आत्मविश्वास बढ़ाती है
एक लोक कथा है पुराने समय में एक गुरुकुल में अनेक शिष्य एक साथ रहते थे। आश्रम बहुत बड़ा था और सभी शिष्यों के रहने के लिए अलग-अलग कुटियाएं बनी हुई थीं। हालांकि शिष्य अपनी-अपनी कुटिया में रहते थे, फिर भी वे एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे।
पढ़ाई, भोजन, आश्रम की सफाई और दूसरे कामों में सभी एक-दूसरे का सहयोग करते थे। उन्हीं शिष्यों में एक शिष्य ऐसा था जो हर समय अपने साथियों के बीच रहता था। वह मिल-जुलकर काम करता और जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद भी करता था, लेकिन कुछ दिनों बाद उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आने लगा। उसने सबसे अलग रहना शुरू कर दिया।
वह न किसी से अधिक बातचीत करता और न ही सामूहिक कामों में पहले की तरह उत्साह दिखाता। आश्रम के दूसरे शिष्य हैरान थे। उन्होंने अपने गुरु को उसके बारे में बताया। गुरु ने कोई तुरंत सलाह नहीं दी। एक शाम वे चुपचाप उस शिष्य की कुटिया में पहुंचे। सर्दियों के दिन थे।
कुटिया के अंदर कुछ लकड़ियां जल रही थीं और शिष्य उनके पास बैठा था। गुरु आए तो शिष्य ने सामान्य रूप से उनका अभिवादन किया। गुरु भी उसके पास बैठ गए। दोनों काफी देर तक बिना कुछ कहे शांत बैठे रहे। कुछ समय बाद गुरु उठे। उन्होंने जलती हुई लकड़ियों में से एक लकड़ी निकाली और उसे थोड़ी दूरी पर अलग रख दिया।
शिष्य चुपचाप यह देखता रहा। कुछ ही देर में वह लकड़ी ठंडी होकर बुझ गई। उसमें आग की एक चिंगारी भी बाकी नहीं रही। गुरु ने फिर वही लकड़ी उठाई और उसे जलती हुई लकड़ियों के बीच रख दिया। थोड़ी ही देर में वह लकड़ी दोबारा जलने लगी और पहले की तरह गर्म हो गई। गुरु बिना कुछ कहे कुटिया से बाहर जाने लगे।
तभी शिष्य ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव, आपका संदेश मैं समझ गया हूं।” गुरु मुस्कुराए। शिष्य बोला, “जब तक लकड़ी बाकी लकड़ियों के साथ थी, तब तक वह जलती रही। अकेली होते ही बुझ गई। मनुष्य भी ऐसा ही है। संगठन और सहयोग से हमें शक्ति मिलती है।
अकेले रहकर हम छोटी-छोटी कठिनाइयों से भी कमजोर पड़ सकते हैं।” उस दिन शिष्य को समझ आया कि आत्मनिर्भर होना अच्छी बात है, लेकिन दूसरों से जुड़ाव, सहयोग और संगठन जीवन को मजबूत बनाते हैं। प्रसंग की सीख
📡 स्रोत: NewsData.io