हर घंटे 30 किलो होगा प्रोसेस:अब पराली और कृषि कचरा आएगा काम, इससे बनेगा कोयले जैसा बेहतर ईंधन, एमपीयूएटी को मिला पेटेंट
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →खेतों में फसल काटने के बाद बचने वाला कचरा (कृषि अवशेष) अब फेंकने या जलाने के बजाय उच्च गुणवत्ता वाले ठोस जैव-ईंधन (बायो-फ्यूल) में बदला जा सकेगा। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) ने एक ऐसी विशेष सतत बायोमास टॉरिफैक्शन इकाई तैयार की है, जिसके डिजाइन का पेटेंट भारत सरकार ने विश्वविद्यालय को प्रदान किया है। यह तकनीक खेतों के कचरे का सही इस्तेमाल करने के साथ-साथ ग्रीन और क्लीन एनर्जी उत्पादन में मील का पत्थर साबित होगी। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.
प्रताप सिंह ने बताया कि नवीकरणीय ऊर्जा अभियांत्रिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.
एनएल पंवार ने इस यूनिट का आविष्कार किया है। इस तकनीक में कृषि अवशेषों को हवा की अनुपस्थिति में 250 से 300 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया से कचरे के भीतर की नमी पूरी तरह खत्म हो जाती है और उसमें दोबारा नमी सोखने की क्षमता भी नहीं रहती। पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधनों पर निर्भरता होगी कम, केंद्र ने दिया 42 लाख का बजट कुलपति के अनुसार यह मशीन लगातार काम करती है और हर घंटे 30 किलोग्राम कृषि अवशेषों को प्रोसेस करके उपयोग में आने वाले ठोस ईंधन में बदल देती है।
यह तकनीक न केवल खेतों में पराली जलाने की समस्या का हल निकालेगी, बल्कि पेट्रोल-डीजल और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों पर इंसानी निर्भरता को भी कम करेगी। तकनीक के जनक डॉ.
एनएल पंवार ने बताया कि इस इनोवेटिव रिसर्च के लिए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 42 लाख रुपए का बजट दिया था। विश्वविद्यालय को मिला यह पेटेंट ग्रामीण क्षेत्रों के लिए पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा समाधान तैयार करने और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में बड़ा योगदान देगा।
📡 स्रोत: NewsData.io