HC की बड़ी टिप्पणी- 'लोगों को पूछने का अधिकार, 24 साल बाद क्यों कराया जा रहा SIR'
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बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने और फॉर्म-8 को खारिज करने को लेकर चुनाव आयोग (ECI) पर कड़ी नाराजगी जताई है.
कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का मुख्य दायित्व है कि नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकें और जब आयोग मतदाताओं के आचरण पर सवाल उठाता है तो नागरिकों को भी यह पूछने का अधिकार है कि 24 साल बाद एसआईआर क्यों कराया जा रहा है.
गोवा में एक परिवार के छह सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था. इसी मामले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी है.
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट जस्टिस वाल्मीकि मिनेजिस और जस्टिस अमित एस.
जामसंडेकर की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग ने जो किया, वह उसके उद्देश्य के अनुरूप नहीं है.
याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों ने कोर्ट को बताया कि वे उसी सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र में एक नए घर में चले गए थे और बूथ स्तर के अधिकारी ने उन्हें पता बदलने के लिए फॉर्म-8 जमा करने को कहा था.
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि फॉर्म पर कार्रवाई के दौरान यह समस्या सामने आई कि उनके निर्वाचक फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला और इस वजह से उनका फॉर्म-8 खारिज कर दिया गया.
24 साल बाद क्यों कराया जा रहा SIR: हाई कोर्ट
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने सवाल किया कि याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर से पहले अधिकारियों को अपने स्थानांतरण की सूचना क्यों नहीं दी थी?
इस पर कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ता भी पूछेगा कि 24 साल बाद यह एसआईआर क्यों, क्योंकि वह भारत का नागरिक है.
इसे बीच में क्यों नहीं किया गया, क्योंकि तब संख्या को नियंत्रित किया जा सकता था.
बेंच ने कहा कि अगर वोटर लिस्ट को लगातार अपडेट किया जाता तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती. जजों ने कहा, यह दोषारोपण का मामला नहीं है.
अधिकारियों के पास जन्म और मृत्यु के प्रमाणपत्रों तक पहुंच है और यदि मतदाता सूची नियमित रूप से अप
📡 स्रोत: ABP Live