देश

होर्मुज संकट से छह महीने में फॉसिल फ्यूल का बिल 330 अरब डॉलर बढ़ा, भारत पर 22.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 29 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
होर्मुज संकट से छह महीने में फॉसिल फ्यूल का बिल 330 अरब डॉलर बढ़ा, भारत पर 22.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ

नई दिल्ली. होर्मुज संकट ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर ऊर्जा के मोर्चे पर भारी दबाव बढ़ा दिया है. संकट शुरू होने के महज छह महीने में फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्म ईंधन का आयात करने वाले देशों को 330 अरब डॉलर से अधिक की अतिरिक्त लागत उठानी पड़ी है.

मार्च से अगस्त 2026 के बीच यह अतिरिक्त खर्च औसतन करीब 55 अरब डॉलर प्रति माह रहा. ऊर्जा और स्वच्छ वायु पर शोध करने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के नए विश्लेषण के मुताबिक, 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद यह फॉसिल फ्यूल की कीमतों में आया सबसे बड़ा और लंबे समय तक कायम रहने वाला झटका है.

सीआरईए के अनुसार, इस संकट का असर और भी व्यापक हो सकता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता ने देशों को महंगे तेल और गैस पर पूरी तरह निर्भर होने से कुछ हद तक बचाया.

वर्ष 2020 के बाद दुनिया में जोड़ी गई स्वच्छ बिजली उत्पादन क्षमता के कारण संकट के शुरुआती पांच महीनों में फॉसिल फ्यूल आयात पर करीब 36 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत से बचाव हुआ. यानी यदि यह स्वच्छ ऊर्जा क्षमता उपलब्ध नहीं होती तो संकट के दौरान देशों का ऊर्जा आयात बिल और अधिक बढ़ सकता था.

होर्मुज संकट की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों के बाद हुई. इसके बाद क्षेत्र में समुद्री परिवहन प्रभावित हुआ और दुनिया के महत्वपूर्ण तेल एवं गैस व्यापार मार्गों पर अनिश्चितता बढ़ गई. इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ा.

तेल, डीजल, गैसोलीन, विमान ईंधन और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की कीमतें युद्ध से पहले बाजार में लगाए गए अनुमान की तुलना में काफी ऊपर चली गईं.

सीआरईए ने मार्च से अगस्त के बीच समुद्र के रास्ते वास्तविक रूप से खरीदे गए ईंधन की कीमत और युद्ध से पहले बाजार की अपेक्षित कीमत के बीच के अंतर को आधार बनाकर अतिरिक्त खर्च का अनुमान लगाया है.

अतिरिक्त खर्च में सबसे बड़ी हिस्सेदारी कच्चे तेल की रही. दुनिया के आयातक देशों को क्रूड ऑयल के लिए करीब 164 अरब डॉलर अधिक चुकाने पड़े. इसकी औसत कीमत युद्ध से पहले बाजार की अपेक्षाओं की तुलना में करीब 35 प्रतिशत अधिक रही.

हालांकि, रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालने वाले रिफाइंड फ्यूल की कीमतों में इससे भी अधिक तेजी देखी गई. डीजल और गैसोइल की कीमतें करीब 59 प्रतिशत तक बढ़ीं और इनके कारण लगभग 74 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत आई. गैसोलीन की कीमत करीब 43 प्रतिशत बढ़ी, जिससे लगभग 36 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च हुए.

प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी संकट का असर दिखाई दिया. अटलांटिक बेसिन में एलएनजी की कीमतें करीब 60 प्रतिशत और पैसिफिक बेसिन में 75 प्रतिशत तक बढ़ीं. इससे आयातक देशों पर करीब 38 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत आई.

विमानन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण जेट फ्यूल की कीमत में भी लगभग 59 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और इससे करीब 20 अरब डॉलर का अतिरिक्त बिल बना. डीजल की बढ़ी कीमतों का असर केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं रहा. माल ढुलाई, उद्योग, कृषि और कई अन्य आर्थिक गतिविधियां डीजल पर निर्भर हैं.

ऐसे में डीजल महंगा होने का असर परिवहन लागत से लेकर खाद्य वस्तुओं और अन्य सामान की कीमतों तक पहुंचता है. सीआरईए के अध्ययन में शामिल 170 देशों में से 134 देशों ने युद्ध से पहले बाजार में अनुमानित कीमतों की तुलना में अधिक कीमत पर डीजल खरीदा.

संकट के छह महीनों में से पांच महीनों के दौरान डीजल का युद्ध प्रीमियम 55 प्रतिशत से अधिक रहा. जून में यह घटकर करीब 43 प्रतिशत हुआ, लेकिन अगस्त में फिर बढ़कर लगभग 65 प्रतिशत हो गया.

दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल अमेरिका भी इस संकट के असर से पूरी तरह नहीं बच सका. 17 अगस्त वाले सप्ताह में अमेरिका में डीजल की औसत कीमत 5.57 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई. यह 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था और उस वर्ष दर्ज रिकॉर्ड कीमत के करीब रही.

इससे स्पष्ट है कि घरेलू उत्पादन मजबूत होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में पैदा हुई उथल-पुथल से किसी बड़ी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अलग रखना मुश्किल है.

सीआरईए के विश्लेषण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई है कि स्वच्छ ऊर्जा किसी देश के लिए केवल जलवायु परिवर्तन से निपटने का साधन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण आधार बनती जा रही है.

वर्ष 2020 के बाद जोड़ी गई स्वच्छ बिजली क्षमता ने संकट के शुरुआती पांच महीनों में फॉसिल फ्यूल आयात करने वाले देशों को करीब 36 अरब डॉलर की लागत से बचाया. इसमें करीब 10.6 अरब डॉलर की बचत ऐसी थी जो युद्ध की वजह से सीधे हुई.

सामान्य परिस्थितियों में भी जिन तेल, गैस और कोयले की जरूरत नहीं पड़ी, उनकी बचत तो हुई ही, संकट के दौरान जब इन ईंधनों की कीमत बढ़ी तो इन्हें महंगी दरों पर खरीदने से भी देश बच गए.

सीआरईए के ऊर्जा विश्लेषक ल्यूक विकेंडेन का कहना है कि तेल और गैस की कीमतों में लंबे समय से होने वाले उतार-चढ़ाव घरेलू और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए जोखिम बने हुए हैं.

ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा में किया गया निवेश केवल पर्यावरणीय नीति नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे ऊर्जा सुरक्षा में निवेश के रूप में भी देखा जाना चाहिए. फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता घटाने में केवल स्वच्छ बिजली की भूमिका नहीं है. परिवहन और हीटिंग जैसे क्षेत्रों का विद्युतीकरण भी तेल की मांग को कम कर रहा है.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के ग्लोबल इलेक्ट्रिक व्हीकल आउटलुक 2025 के मुताबिक, दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे 2030 तक रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल की खपत कम हो सकती है.

यह मात्रा लगभग उतनी ही है जितना कच्चा तेल सऊदी अरब फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करने वाली अपनी ईस्ट-वेस्ट यनबू पाइपलाइन के जरिये भेजता है. ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा दबाव गरीब और निम्न आय वाले देशों पर पड़ा.

सीआरईए के मुताबिक, निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों ने वर्ष 2024 की अपनी जीडीपी के औसतन एक प्रतिशत के बराबर अतिरिक्त राशि फॉसिल फ्यूल की बढ़ी लागत पर खर्च की. इसके मुकाबले उच्च आय वाले देशों पर यह बोझ करीब 0.45 प्रतिशत रहा.

विशेषज्ञों के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्थाओं के पास महंगे ईंधन के दौर को कुछ समय तक सहने की क्षमता अधिक होती है, जबकि कम आय वाले देशों में ईंधन कीमतों का सीधा असर महंगाई, परिवहन और खाद्य कीमतों पर पड़ता है. भारत भी इस संकट से प्रभावित होने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहा.

सीआरईए के आंकड़ों के अनुसार, मार्च से अगस्त 2026 के बीच भारत को फॉसिल फ्यूल आयात के लिए करीब 22.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत उठानी पड़ी. इस मामले में भारत दूसरे स्थान पर रहा. चीन पर सबसे अधिक करीब 35.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा. अमेरिका करीब 16.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत के साथ तीसरे स्थान पर रहा.

सबसे अधिक अतिरिक्त लागत वाले शीर्ष 10 देशों में चीन, भारत, अमेरिका के अलावा नीदरलैंड्स, दक्षिण कोरिया, इटली, जापान, फ्रांस, स्पेन और मिस्र शामिल रहे.

सीआरईए ने इस अनुमान को तैयार करने के लिए मार्च से अगस्त के दौरान समुद्र के रास्ते आयात किए गए क्रूड ऑयल, फ्यूल और गैस की वास्तविक कीमतों की तुलना युद्ध से पहले बाजार की अपेक्षित कीमतों से की. इसके लिए हमलों से पहले के 12 दिनों की फ्यूचर्स कर्व को आधार बनाया गया.

इस अवधि में बाजार वर्ष 2026 के अलग-अलग डिलीवरी महीनों के लिए कीमतों का अनुमान पहले ही लगा चुका था. इसलिए संस्था का कहना है कि यह भविष्यवाणी नहीं, बल्कि युद्ध से पहले बाजार की अपनी अपेक्षाओं और उसके बाद सामने आई वास्तविक कीमतों के बीच का अंतर है.

मार्च से जुलाई तक वास्तविक आयात की मात्रा जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कंपनी केप्लर के आंकड़ों से ली गई. इस अवधि में करीब 281.7 अरब डॉलर के आयात को विश्लेषण में शामिल किया गया.

अगस्त के लिए लगभग 15 प्रतिशत आंकड़ा मॉडल के आधार पर निकाला गया, क्योंकि समुद्री परिवहन से जुड़े आंकड़ों को अंतिम रूप मिलने में कई सप्ताह लगते हैं. विश्लेषण तैयार किए जाने के समय अगस्त के केवल पांच कारोबारी दिनों के आंकड़े उपलब्ध थे.

हालांकि, सीआरईए का 330 अरब डॉलर से अधिक का अनुमान संकट की वास्तविक आर्थिक कीमत का पूरा आकलन नहीं है. इसमें पाइपलाइन से आने वाली गैस, कोयला, फ्यूल ऑयल और नैफ्था को शामिल नहीं किया गया है.

इसके अलावा माल ढुलाई की बढ़ी लागत, युद्ध जोखिम बीमा और दूसरी अतिरिक्त लागतों को भी गणना में नहीं जोड़ा गया है. ईंधन की कीमत बढ़ने के कारण मांग में आई कमी को भी अलग से शामिल नहीं किया गया. महंगे ईंधन या उसकी कमी के कारण लोगों और अर्थव्यवस्थाओं को हुए व्यापक आर्थिक नुकसान का अनुमान भी इसमें शामिल नहीं है.

इसी वजह से सीआरईए का मानना है कि 330 अरब डॉलर से अधिक का आंकड़ा वास्तविक कुल लागत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करता, बल्कि अपेक्षाकृत संयमित अनुमान है.

होर्मुज संकट ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में तेल और गैस पर अत्यधिक निर्भरता केवल कीमतों का जोखिम नहीं है, बल्कि युद्ध और समुद्री आपूर्ति मार्गों में व्यवधान की स्थिति में यह सीधे देशों की अर्थव्यवस्था, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है.

भारत के लिए 22.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ इस चुनौती की गंभीरता को स्पष्ट करता है.

📡 स्रोत: NewsData.io

📰 पूरी खबर पढ़ें (NewsData.io पर जाएं)
J
JKS News Desk

वॉयस ऑफ क्रांति की संपादकीय टीम आपके लिए भोपाल, मध्यप्रदेश और देश की सटीक और विश्वसनीय समाचार प्रस्तुत करती है।