IIT कानपुर में मच्छरों के ब्रेन पर रिसर्च:कौन सी गंध के कारण इंसानों का खून चूसते हैं इसका पता लगाने की कोशिश, दिमागी गतिविधियां जानेंगे
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →कानपुर आईआईटी के डिपार्टमेंट ऑफ बायोलॉजिकल साइंसस् एंड बायोइंजीनियरिंग ने मच्छरों के दिमाग पर रिसर्च शुरू किया है। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि आखिर इंसानों के खून चूसने के लिए मच्छर के दिमाग मे ऐसा क्या आता है कि वो किस इंसान के पास जाए या न जाए।
इस रिसर्च में जानने की कोशिश की जायेगी कि मच्छर जब इंसान के पास आता है तो आखिर ऐसा क्या होता है कि वह हमारी गंध को पहचानकर हमारी ओर आकर्षित हो जाता है? इंसान का खून पीने के दौरान उसके दिमाग में किस तरह की गतिविधियां होती हैं और वह अलग-अलग गंध के आधार पर कैसे तय करता है कि किसकी ओर जाना है और किससे दूर रहना है?
इन सवालों को समझने के लिए IIT कानपुर के प्रोफेसर ने मच्छर के ब्रेन की एक्टिविटी को इलेक्ट्रोड के जरिए रिकॉर्ड करने की दिशा में काम शुरू किया है। प्रोफेसर का फोकस यह समझना है कि मच्छर अलग-अलग गंध को अपने दिमाग में किस तरह पहचानता और प्रोसेस करता है।
इस रिसर्च से भविष्य में ऐसे सुरक्षित केमिकल विकसित करने में मदद मिल सकती है, जो मच्छरों को इंसानों से दूर रखें। साथ ही ऐसे केमिकल भी तैयार किए जा सकते हैं, जो मच्छरों को इंसानों की बजाय किसी खास ट्रैप की ओर आकर्षित करें।
पहले बड़े कीड़ों पर किया काम, फिर मच्छरों पर शुरू हुई रिसर्च आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर नितिन गुप्ता ने बताया कि संस्थान ज्वाइन करने से पहले वे अमेरिका में बड़े कीड़ों, जैसे ग्रासहॉपर और लोकस्ट, पर काम कर रहे थे।
वहां उन्होंने न्यूरोसाइंस की ऐसी तकनीकें सीखीं, जिनके जरिए इलेक्ट्रोड लगाकर कीड़ों के ब्रेन में होने वाली गतिविधियों को समझा जा सकता है। साल 2014 में भारत आने के बाद उन्होंने यहां मच्छरों की समस्या को देखा।
इसके बाद उनके मन में विचार आया कि जिन तकनीकों का इस्तेमाल बड़े कीड़ों के ब्रेन को समझने के लिए किया गया है, उन्हें मच्छरों पर क्यों न आजमाया जाए। प्रोफेसर ने बताया कि इसी विचार के बाद उनकी लैब में मच्छरों पर रिसर्च शुरू हुई। इसके लिए लैब में मच्छरों की कॉलोनी भी तैयार की गई, जहां मच्छरों को पाला जाता है।
इंसान की गंध मच्छर के ब्रेन तक कैसे पहुंचती है? जब मच्छर इंसान की गंध महसूस करता है तो गंध के अणु यानी मॉलिक्यूल्स उसके एंटीना तक पहुंचते हैं। एंटीना इन संकेतों को न्यूरॉन्स के जरिए मच्छर के ब्रेन तक पहुंचाता है।
अब यह समझने की कोशिश की जा रही हैं कि ब्रेन के अंदर कौन-कौन से न्यूरॉन्स एक्टिवेट होते हैं और मच्छर इन संकेतों को किस तरह प्रोसेस करता है। यानी मच्छर के लिए कोई गंध आकर्षित करने वाली है या उससे दूर जाने वाली इस फैसले के पीछे उसके ब्रेन में क्या गतिविधि होती है, इसे समझना इस रिसर्च का अहम हिस्सा है।
पहली बार मच्छर के ब्रेन में इलेक्ट्रोड लगाकर एक्टिविटी समझने की कोशिश प्रोफेसर ने बताया कि इस दिशा में उन्होंने मच्छर के ब्रेन में इलेक्ट्रोड लगाकर उसकी न्यूरल एक्टिविटी को रिकॉर्ड करने का काम शुरू किया है।
इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग गंध मच्छर के दिमाग में मौजूद न्यूरॉन्स को किस तरह सक्रिय करती हैं और मच्छर उन संकेतों के आधार पर इंसान की ओर जाने या उससे दूर रहने का फैसला कैसे करता है। क्या डेंगू-मलेरिया रोकने में मदद मिलेगी?
फिलहाल टीम सीधे तौर पर डेंगू या मलेरिया की दवा या बीमारी रोकने के किसी तरीके पर काम नहीं कर रही है। उनका काम अभी बेसिक न्यूरोसाइंस और मच्छर के व्यवहार को समझने पर केंद्रित है। हालांकि, इस रिसर्च से भविष्य में नए और सुरक्षित मच्छर रिपेलेंट विकसित करने में मदद मिल सकती है।
प्रोफेसर के मुताबिक, बाजार में मिलने वाले कई रिपेलेंट अलग-अलग केमिकल के परीक्षण के बाद विकसित हुए हैं। यानी कई केमिकल आजमाए गए और देखा गया कि इनमें से कौन-सा मच्छरों को दूर भगाता है। अब प्रोफेसर यह समझना चाहते हैं कि कोई केमिकल मच्छर को दूर भगाता कैसे है।
अगर यह प्रक्रिया समझ में आती है तो उसके आधार पर ऐसे नए केमिकल खोजे जा सकते हैं, जो इंसानों के लिए सुरक्षित हों और मच्छरों को प्रभावी तरीके से दूर रखें। दूसरा बड़ा फायदा- मच्छरों को इंसान की जगह ट्रैप की ओर खींचना इस रिसर्च का एक और संभावित इस्तेमाल मच्छरों को भगाने के बजाय उन्हें आकर्षित करने में हो सकता है।
प्रोफेसर का कहना है कि अगर ऐसे केमिकल खोज लिए जाएं, जिनकी गंध मच्छरों को बहुत ज्यादा आकर्षित करती है, तो उनका इस्तेमाल मच्छर ट्रैप बनाने में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी कमरे में ऐसा बॉक्स या ट्रैप लगाया जाए, जिसमें मच्छर को आकर्षित करने वाला केमिकल मौजूद हो।
इससे मच्छर इंसान की तरफ आने के बजाय उस ट्रैप की ओर जा सकता है और वहां उसे कैप्चर किया जा सकता है। 5 से 10 साल में दिख सकता है व्यावहारिक असर प्रोफेसर के मुताबिक, इस रिसर्च से निकलने वाले संभावित व्यावहारिक इस्तेमाल में नए सुरक्षित रिपेलेंट और मच्छरों को आकर्षित करने वाले ट्रैप शामिल हैं।
हालांकि, इनके विकसित होने और आम लोगों तक पहुंचने में समय लगेगा। वैज्ञानिक का अनुमान है कि अगले 5 से 10 साल के बीच इस तरह के व्यावहारिक एप्लीकेशन देखने को मिल सकते हैं। किस मच्छर पर हो रही रिसर्च? आईआईटी कानपुर की टीम एडीज एजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छर पर काम कर रही है।
यह वही मच्छर है, जिसके शरीर पर काले-सफेद निशान दिखाई देते हैं। एडीज एजिप्टी डेंगू, चिकनगुनिया और जीका वायरस जैसी बीमारियां फैलाने वाला प्रमुख मच्छर है।
यानी इस रिसर्च का मकसद फिलहाल बीमारी की दवा बनाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि मच्छर गंध को कैसे पहचानता है, उसका ब्रेन उस गंध को कैसे प्रोसेस करता है और फिर वह इंसान की ओर जाने या दूर रहने का फैसला कैसे करता है।
📡 स्रोत: NewsData.io