इतिहास

ईरान का बादशाह नादिर शाह अफ़शार जिसने मुग़ल सल्तनत की कमर तोड़ दी, मगर अपनी ही औलाद की आँखें निकलवाकर इतिहास का सबसे दर्दनाक फैसला भी लिया

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 14 अगस्त 2026 👁️ 44 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
ईरान का बादशाह नादिर शाह अफ़शार  जिसने मुग़ल सल्तनत की कमर तोड़ दी, मगर अपनी ही औलाद की आँखें निकलवाकर इतिहास का सबसे दर्दनाक फैसला भी लिया

इतिहास में कुछ शासक अपनी सल्तनत की वजह से याद किए जाते हैं और कुछ अपनी तलवार की वजह से। लेकिन नादिर शाह अफ़शार उन विरले योद्धाओं में गिना जाता है, जिसकी सैन्य प्रतिभा ने उसे "एशिया का नेपोलियन" कहलवाया। यह उपाधि उसे नेपोलियन से पहले मिली नहीं थी, बल्कि बाद के इतिहासकारों ने उसकी युद्धक रणनीति, अनुशासन और लगातार जीतों की तुलना नेपोलियन बोनापार्ट से करते हुए उसे यह नाम दिया।

लेकिन नादिर शाह की कहानी किसी शाही महल से शुरू नहीं होती।

ख़ुरासान के एक बेहद गरीब परिवार में जन्मे नादिर क़ुली ने बचपन में गरीबी, गुलामी और अपमान देखा। कहा जाता है कि बचपन में वह अपनी मां के साथ गुलाम बनाकर बेच दिया गया था। बाद में वहां से भाग निकला और धीरे-धीरे एक साधारण सैनिक से सेनापति और फिर ईरान का बादशाह बन गया। उसने कभी अपने साधारण अतीत को छिपाने की कोशिश नहीं की। यह बात उसे अपने समय के दूसरे बादशाहों से अलग बनाती है।

जब ईरान टूटने की कगार पर था

18वीं सदी की शुरुआत में ईरान की सफ़वी सल्तनत लगभग बिखर चुकी थी। अफ़गानों ने इस्फ़हान पर कब्ज़ा कर लिया था। उत्तर से रूस और पश्चिम से उस्मानी (ऑटोमन) सल्तनत ईरान के हिस्सों पर दावा कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ईरान का नाम इतिहास से मिट जाएगा।

इन्हीं हालात में नादिर क़ुली ने एक छोटी-सी फौज तैयार की। उसने पहले अफ़गानों को हराया, फिर रूस और उस्मानियों को पीछे हटने पर मजबूर किया। कुछ ही वर्षों में उसने बिखरे हुए ईरान को दोबारा एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। 1736 में उसने खुद को ईरान का शाह घोषित किया।

युद्ध का ऐसा उस्ताद जिसने लड़ाई का तरीका बदल दिया

नादिर शाह की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी बहादुरी नहीं थी, बल्कि उसकी सैन्य रणनीति थी। उसने समझ लिया था कि अब तलवारों का दौर खत्म हो रहा है और बारूद का युग शुरू हो चुका है।

उसने लंबी दूरी तक मार करने वाली बंदूकों से लैस सैनिक तैयार किए और ऊंटों पर लगने वाली हल्की तोपों (ज़म्बूरक) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। इससे उसकी सेना तेज़ी से आगे बढ़ सकती थी और दुश्मन पर अचानक हमला कर सकती थी। दामगान की लड़ाई में इसी रणनीति ने अफ़गान सेना को बुरी तरह पराजित किया और नादिर शाह की ख्याति पूरे एशिया में फैल गई।

फिर उसकी नज़र हिंदुस्तान पर पड़ी

लगातार युद्धों ने ईरान का खजाना खाली कर दिया था। विशाल सेना को बनाए रखने के लिए धन चाहिए था और उस समय दुनिया की सबसे समृद्ध सल्तनत मानी जाती थी—मुगल सल्तनत।

उधर मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला के शासन में दरबार गुटबाज़ी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कमजोरी से जूझ रहा था। नादिर शाह के जासूस लगातार उसे दिल्ली की कमजोरियों की जानकारी भेज रहे थे। उसे यकीन हो गया कि हिंदुस्तान पर हमला करने का यही सबसे उपयुक्त समय है।

करनाल की जंग जिसने इतिहास बदल दिया

1739 में करनाल के मैदान में नादिर शाह की लगभग एक लाख सैनिकों की सेना का सामना मुगलों की कहीं बड़ी सेना से हुआ। संख्या में कम होने के बावजूद उसकी रणनीति ने मुगल सेना को कुछ ही घंटों में परास्त कर दिया। मुगल बादशाह उसके सामने झुकने को मजबूर हो गया।

इसके बाद नादिर शाह विजेता की तरह दिल्ली में दाखिल हुआ। शुरू में उसका उद्देश्य केवल भारी मुआवज़ा और धन लेना बताया जाता है, लेकिन शहर में उसके सैनिकों पर हुए हमलों और फैली अफवाहों के बाद हालात हिंसक हो गए। इसके बाद दिल्ली में भीषण कत्लेआम और लूटपाट हुई, जिसमें हजारों लोग मारे गए और शहर की अपार संपत्ति लूट ली गई। इसी दौरान तख्त-ए-ताऊस, कोहिनूर और दरिया-ए-नूर जैसे प्रसिद्ध रत्न भी ईरान ले जाए गए।

मुगल सल्तनत कभी संभल नहीं सकी

इतिहासकारों का मानना है कि नादिर शाह के हमले ने मुगल साम्राज्य की शक्ति का भ्रम तोड़ दिया। प्रांतों ने केंद्र से दूरी बनानी शुरू कर दी और कुछ ही वर्षों बाद अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला। कई इतिहासकार इस आक्रमण को भारत में मुगल सत्ता के तेज़ पतन का निर्णायक मोड़ मानते हैं।

ताकत का नशा और दर्दनाक अंत

दिल्ली से लौटने के बाद नादिर शाह पहले जैसे नहीं रहे। धीरे-धीरे वे अत्यधिक संदेहग्रस्त और कठोर होते गए। उन्हें हर तरफ़ साज़िश दिखाई देने लगी। यहां तक कि उन्होंने अपने ही बेटे रज़ा क़ुली मिर्ज़ा पर विश्वासघात का शक कर उसकी आंखें निकलवा दीं। बाद में उन्हें अपने इस फैसले पर गहरा पछतावा हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

1747 में उनके अपने ही सेनापतियों और अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी। जिस शख्स ने तीन बड़ी ताकतों को झुकाया था, वह अंततः अपने ही लोगों के हाथों मारा गया।

नादिर शाह अफ़शार का जीवन एक विरोधाभास है। एक ओर वह असाधारण सैन्य प्रतिभा वाला सेनापति था जिसने बिखरे हुए ईरान को फिर से खड़ा किया, तो दूसरी ओर दिल्ली पर उसके हमले ने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की दिशा बदल दी। उसकी कहानी यह भी बताती है कि केवल तलवार से साम्राज्य जीते जा सकते हैं, लेकिन उन्हें हमेशा कायम नहीं रखा जा सकता।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।