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इस्लामाबाद सिंड्रोम: वेस्टर्न स्पाई और पाकिस्तानी ISI के बीच बढ़ा अविश्वास, फ्रांस की DGSE और CIA से जुड़े रहस्यमयी मामलों ने बढ़ाया शक

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 15 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
इस्लामाबाद सिंड्रोम: वेस्टर्न स्पाई और पाकिस्तानी ISI के बीच बढ़ा अविश्वास, फ्रांस की DGSE और CIA से जुड़े रहस्यमयी मामलों ने बढ़ाया शक

इस्लामाबाद सिंड्रोम: इस्लामाबाद में जासूसी की दुनिया लंबे समय से शक, टकराव और गुप्त अभियानों से भरी रही है.

फ्रांस की विदेशी खुफिया एजेंसी DGSE और अमेरिकी CIA समेत पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस के साथ रिश्ते हमेशा जटिल रहे हैं.

अब एक नई रिपोर्ट में ऐसे कई रहस्यमयी घटनाक्रमों का जिक्र किया गया है, जिन्हें कुछ खुफिया अधिकारियों ने “इस्लामाबाद सिंड्रोम” की संज्ञा दी है.

फ्रांसीसी जासूस के रेडिएशन एक्सपोजर का मामला रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2010 में इस्लामाबाद स्थित फ्रांसीसी दूतावास में तैनात DGSE अधिकारी जेरोम (बदला हुआ नाम) ने रेडिएशन मापने वाले डोजीमीटर से जांच की, जिसमें उसके रेडिएशन के संपर्क में आने के संकेत मिले.

बाद की जांच में उसके क्रोमोसोम में बदलाव पाए गए, जो रेडिएशन एक्सपोजर का परिणाम हो सकते थे.

कुछ अन्य DGSE अधिकारियों ने भी अपने स्तर पर जांच कराई, जिसमें कुछ के डोजीमीटर में रेडिएशन एक्सपोजर दर्ज हुआ.

इस घटना के बाद फ्रांसीसी अधिकारियों को रूस के पूर्व खुफिया अधिकारी अलेक्जेंडर लिट्विनेंको की मौत की याद आई, जिनकी 2006 में पोलोनियम-210 जहर से मौत हुई थी.

इस मामले में शक की सुई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की तरफ गई, जो उस समय जनरल अहमद शुजा पाशा के नेतृत्व में थी.

रिपोर्ट के अनुसार, उस समय DGSE ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जानकारियां जुटाने के लिए एक अहम स्रोत तैयार किया था.

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस को आशंका थी कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम और परमाणु सामग्री आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों के हाथ लग सकती है. 1998 में परमाणु शक्ति घोषित पाकिस्तान का परमाणु भंडार 2010 तक करीब सौ हथियारों तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था.

साथ ही, परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान के नेटवर्क और उत्तर कोरिया के साथ संभावित परमाणु संबंधों को लेकर पश्चिमी खुफिया एजेंसियां सतर्क थीं.

DGSE और ISI के बीच बढ़ी खुफिया जंग रिपोर्ट में दावा किया गया है कि DGSE और ISI के बीच तनाव तब बढ़ा जब फ्रांसीसी एजेंटों ने पाकिस्तान में अपने खुफिया स्रोत विकसित करने शुरू किए.

कराची में तैनात एक फ्रांसीसी अधिकारी को स्थानीय स्रोत भर्ती करने के बाद देश छोड़ने के लिए कहा गया. इसके बाद ISI की निगरानी फ्रांसीसी एजेंटों पर और बढ़ गई.

हालांकि, फ्रांसीसी जांच एजेंसियों और फ्रेंच रेडिएशन प्रोटेक्शन इंस्टीट्यूट (IRSN) की जांच में रेडिएशन के ठोस सबूत नहीं मिले. 2010-11 में इस्लामाबाद पहुंची IRSN टीम ने भी दूतावास परिसर में कोई असामान्य रेडिएशन नहीं पाया.

CIA स्टेशन चीफ की बीमारी और ISI पर शक रिपोर्ट के मुताबिक, DGSE से जुड़े इस मामले ने अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों का ध्यान भी खींचा.

CIA और MI6 अधिकारियों ने फ्रांसीसी अधिकारियों के साथ बैठकें कीं और ISI की संभावित भूमिका को लेकर चिंता जताई.

इसके कुछ समय बाद इस्लामाबाद में CIA स्टेशन चीफ मार्क केल्टन भी एक रहस्यमयी बीमारी से जूझने लगे. 2011 में ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद ऑपरेशन के बाद उन्हें तेज पेट दर्द की शिकायत हुई और इलाज के लिए अमेरिका लौटना पड़ा.

CIA डॉक्टरों ने कई संभावनाओं पर विचार किया, जिनमें जहर दिए जाने की आशंका भी शामिल थी. हालांकि, किसी भी जांच में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी.

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मौजूद बैक्टीरिया और अन्य स्वास्थ्य कारण भी बीमारी की वजह हो सकते थे.

ISI को लेकर पश्चिमी एजेंसियों में गहरा अविश्वास रिपोर्ट के अनुसार, रेडिएशन एक्सपोजर और कथित जहर देने जैसी आशंकाओं ने पश्चिमी खुफिया एजेंसियों में ISI के प्रति पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा किया.

हालांकि, इन घटनाओं में ISI की प्रत्यक्ष भूमिका साबित नहीं हो सकी. 'इस्लामाबाद सिंड्रोम' की कहानी दरअसल उन जटिल रिश्तों को दिखाती है, जहां आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और परमाणु सुरक्षा जैसे मुद्दों पर साझेदारी के बावजूद खुफिया एजेंसियां एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पातीं.

इस्लामाबाद: दुनिया की खुफिया गतिविधियों का केंद्र अफगानिस्तान युद्ध, आतंकवादी संगठनों पर निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों के कारण पाकिस्तान पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है.

अमेरिका ने 9/11 के बाद पाकिस्तान के साथ आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग बढ़ाया, लेकिन इसी दौरान पाकिस्तान की नीतियों और कुछ आतंकी संगठनों को लेकर वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच मतभेद भी सामने आते रहे जिससे जुड़ी कई रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और सामने आई.

खुफिया एजेंसियों के बीच संबंध आमतौर पर सार्वजनिक नहीं होते, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी इंटेलिजेंस साझेदारी की नींव भरोसा, सूचना साझा करने और रणनीतिक समानता पर टिकी होती है.

जब देशों के हित अलग-अलग होते हैं तो सहयोग के बावजूद प्रतिस्पर्धा और अविश्वास बना रह सकता है.

📡 स्रोत: NewsData.io

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